दि पेटेंट (संशोधन) अधिनियम, 1999

दि पेटेंट (संशोधन) अधिनियम, 1999

यह अधिनियम भारत में डब्ल्यू.टी ओ आवश्यकताओं के अनुरूप पेटेंट उत्पादों को प्रस्तुत करने की प्रस्तावना जैसा है। इस अधिनियम के द्वारा घरेलू कानून को ट्रिप्स समझौते के अन्तर्गत रखा गया इसके अनुसार मेल बॉक्स सिस्टम लगाना तथा संपूर्ण विपणन अधिकार प्रदान करना आवश्यक था। ई.एम.आर. किसी अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनी को फार्मासिटिकल तथा कृषि रसायन उत्पादों को पूर्णतया भारत में बेचने के अधिकार प्रदान करता है। मेल बॉक्स में सभी फार्मासिटिकल तथा कृषि रसायन उत्पाद सभी आवेदन प्रस्तुत किए जाने थे। यह बॉक्स 2005 में खोला जाएगा तथा तब तक किन्हीं आवेदनों का परीक्षण सम्भव नहीं हो पाएगा।

निम्नलिखित तीन स्थितियों में ई.एम आर. दिया जा सकता है-


1.1 जनवरी, 1995 के बाद नई केमिकल एनटिटी प्रस्तुत की जाती थी।

2.उत्पाद का भारत में पहले कभी विपणन नहीं किया गया होना चाहिए।

3.आवश्यक लाइसेंसिंग में जहाँ सरकार तीन चार कम्पनियों को वही उत्पाद बनाने का लाइसेंस प्रदान कर सकती है यदि बहुत बड़ी माँग-पूर्ति चल रही हो तो।

इस प्रकार ई.एम आर. वास्तव में एक उत्पाद पेटेंट की तरह ही है। सबसे बड़ा अन्तर यह है कि ई.एम.आर. यह कम्पनी के पेटेंट कानून जाँच के बदले में जारी किया जाता है। इसका अर्थ है कि दो कम्पनियाँ एक ही दवाई के लिए आवेदन दे सकती हैं तथा ई.एम.आर. प्रदान किया जा सकता है।

अधिनियम के अध्याय IV (ए) में ई.एम आर. की स्वीकृति के लिए नियम दिए गए हैं। यह सरकार को शक्ति देता है कि वर्णित फॉर्म में आवेदन लिए जाएं तथा फीस का भुगतान किया जाए। ई.एम.आर.आवेदनों की योग्यता मापदंड भी विहित किए गए हैं। ई.एम.आर. के लिएआवेदन की योग्यता के लिए किसी उत्पाद को पेटेंट आवेदन भारत में प्रस्तुत करना होगा, उत्पाद पेटेंट को अन्य किसी डब्ल्यू.टी.ओ. सदस्य राष्ट्र ने स्वीकृति दी हो तथा विपणन स्वीकृति भी किसी सदस्य राष्ट्र द्वारा प्रदान की गई हों। भारत में विपणन स्वीकृति ई एम आर. प्राप्त करने के पूर्व ही ले ली जानी चाहिए।

अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि “आवश्यक
वितरण के लिए पूर्ण अधिकारों के लिए आवेदन’ इसलिए आवश्यक लाइसेंसिंग सम्बन्धी प्रावधानों में आवश्यक संशोधन के लिए बिक्री या सतुष्ट हो कि जिस व्यक्ति को पेटेंट अधिकार दिया गया है उसके लाइसेंसिंग प्रावधान ई एम आर के पेटेंटों पर पूर्णतया लागू होंगे।

इसके अलावा अधिनियम के अनुसार, “यदि केन्द्र सरकार अतिरिक्त किस अन्य व्यक्ति द्वारा जनहित में उस वस्तु को बेचा जाना या व्यक्ति द्वारा उस वस्तु को अव्यावसायिक प्रयोग के लिए बेच या वितरित कर सकती है। सरकार के पास यह अधिकार भी सुरक्षित है कि वह “उस वस्तु या पदार्थ को प्राधिकृत सत्ता द्वारा निर्धारित मूल्य पर बेचने का अधिकार रखती है क्योंकि ऐसा वह जनहित में करती है।”

अधिनियम की अन्य महत्त्वपूर्ण बातें

(1) अधिनियम को पूर्व प्रभाव से | जनवरी 1995 से प्रभावी माना जायेगा जो यह सुनिश्चित करेगा कि जनहित को सुरक्षित रखा जाएगा।

(2) सरकार को यदि लगे यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए
अहितकर है तो किसी भी सूचना जारी करने, रोकने तथा किसी पेटेंट आविष्कार के बारे में आवेदन का अधिकार है।

(3) राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर सरकार पेटेंट को समाप्त करने का निर्णय या अन्य कार्रवाई भी कर सकती है।

(4) अधिनियम द्वारा भारत में किए आविष्कार को विदेशों में।आवेदन करने पर भी प्रतिबन्ध हटा दिया गया है। वर्तमान में पेटेंट अधिनियम 1970 की धारा 30 के अन्तर्गत भारत में रहने वाला कोई भी व्यक्ति भारत से बाहर भारत सरकार की स्वीकृति पेटेंट की स्वीकृति के लिए आवेदन नहीं कर सकता जबकि यह आवेदन भारत में संशोधन अधिनियम के इस खण्ड के समाप्त होने से छ: सप्ताह पूर्व न किया गया हो।

(5) यह अधिनियम मार्च 26,1995 के बाद दिए गए आवेदनों को भी वैधता प्रदान करता है।

(6) यह संशोधन दवाइयों की घरेलू व्यवस्था को सुरक्षित
रखने में सहायता करता है तथा यह प्रावधान करता है कि जनता में प्रचलित तथा भारतीय व्यवस्था से बनी किसी भी वस्तु या पदार्थ को बेचने या वितरित करने का एकाधिकार प्रदान नहीं किया जायेगा।

संशोधन अधिनियम के प्रभाव

इस अधिनियम के अनेक प्रभाव कुछ निम्नलिखित है-

(1) ई.एम.आर. बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सहायता करते हैं।क्योंकि वे नई दवाइयाँ बनाने में संकोच करते हैं क्योंकि भारतीय कम्पनियाँ चालू पेटेंट साम्राज्य में तुरंत दवाइयों निकालती रहती हैं। नए ई एम आर. जनवरी 1995 के बाद आवेदित रासायनिक इकाइयों के लिए होगा।

(2)नए परिदृश्य में छोटी भारतीय फर्मा कम्पनियों के लिए प्रतियोगिता कठिन हो जाएगी तथा नई दवा विकसित करने के लिए रु. 100 करोड़ खर्च करना पड़ेगा जो कि मध्यम श्रेणी कम्पनियों की क्षमता से हट कर है। इसलिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अंतरास्ट्रीय बाजार आकर में अपना अधिक भाग लेने के लिए खड़ी हो जाएंगी।

(3) भारत को पेटेंट देना ही होगा-जैसे कि देश में किसी
एकाधिकार उत्पाद पर कभी कोई परीक्षण किया ही न गया हो तथा उसमें काफी बाजार क्षमता हो।

(4) ई.एम.आर. देने की मांग के अनुसार, पेटेंट आवेदन के अन्तर्गत आवरित उत्पाद, किसी भी डब्ल्यू टी.ओ. देश द्वारा पेटेंट देने के आधार पर, भारत को अपने अधिकारों का समर्पण करना होगा, क्योंकि उसे तो अपने मानकों के अनुसार पेटेंट आवेदन को जाँचने तथा उसकी योग्यता के परीक्षण की स्वतन्त्रता प्राप्त है।

पेटेंट (संशोधन) अधिनियम, 2004

1970 के पेटेंट अधिनियम में पहला संशोधन मार्च 1999 में तथा दूसरा संशोधन जून 2002 में किया गया था। तीसरा संशोधन 26 दिसम्बर 2004 के अध्यादेश के जरिए किया गया है तथा इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

2.आपातिक जन स्वास्थ्य की स्थितियों का सामना करने के लिए ऐसे देशों को जहाँ अपर्याप्त या कोई विनिर्माण क्षमता नहीं है, दवाओं के निर्यात के अनिवार्य लाइसेंस देने में समर्थ बनवाने के लिए प्रावधान करना।

1.दवाओं, खाद्य और रसायनों को उत्पाद पेटेंट संरक्षण देकर प्रौद्योगिकी के सभी क्षेत्रों को यह संरक्षण दिया जाएगा।

3.विशिष्ट विपणन अधिकारों (ई.एम.आर.) से सम्बन्धित उपबन्धों को हटाना और पहले से दिए जा चुके ई.एम आर. की सुरक्षा करने के लिए संक्रमण-प्रावधान किया जाना।

4.पेटेंट कार्यालय में पेटेंट देने से पूर्व और देने के बाद दोनों ही स्थितियों में विरोध करके इस प्रणाली को सुप्रवाही बनाने की दृष्टि से विरोध प्रक्रियाओं से सम्बन्धित उपबन्धों में संशोधन
करना।

5.राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बन्धित उपबन्धों को मजबूत बनाना तथा दोहरे प्रयोग की प्रौद्योगिकियों के विदेश में पेटेंट किए जाने के प्रति रक्षोपाय करना।

6.सॉफ्टवेयर सम्बन्धी आविष्कारों के पेटेंट से सम्बन्धित उपबन्धों का स्पष्टीकरण जहाँ वे उद्योग में तकनीकी अनुप्रयोग से जुड़े हों अथवा हार्डवेयर से जुड़े हों।

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