प्रबन्धन का अर्थ

प्रबन्ध का अर्थ और संकल्प

“Management” शब्द का विभिन्न प्रकार से प्रयोग किया गया है। कई बार इसका अर्थ किसी एक संस्था में प्रबन्ध करने वाले व्यक्तियों का समूह होता है। कभी प्रबन्ध का अर्थ संगठित करना, स्टाफ भर्ती करना, तालमेल तथा नियन्त्रण की प्रक्रिया है। इसे ज्ञान, विज्ञान और अनुशासन का रूप भी माना जाता है। कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो इसे नेतागिरी और निर्णय करने की तकनीक मानते हैं या इसको तालमेल करने का साधन मानते हैं या इसको तालमेल करने का साधन मानते हैं, कुछ दूसरे इसे आर्थिक स्रोत, उत्पादन का एक कारण या सत्ता की एक व्यवस्था मानते हैं।

थीओ हेमैन ने अपनी पुस्तक ‘Professional Management, Theory and Practice’ में प्रबन्ध शब्द को तीन अलग-अलग अर्थों के रूप में प्रयोग किया है।
(क) प्रबन्ध नाम के रूप में,
(ख) प्रक्रिया के रूप में तथा
(ग) अनुशासन के रूप में।

प्रबन्ध नाम के रूप में जब इसे नाम के रूप में प्रयोग किया जाता है, तब इसका अर्थ वे सब व्यक्ति होते हैं जो दूसरे लोगों से काम करवाने के साथ जुड़े होते हैं। इस प्रकार से एक संगठन में सारे वे लोग जो अपने अधीन कर्मचारियों के काम का निरीक्षण करते हैं तथा व्यापारिक संस्था के मुख्य अधिकारी मिलकर, प्रबन्ध या व्यवस्था कहलाते हैं।

उदाहरण के तौर पर, डायरैक्टरों का बोर्ड, मैनेजिंग डायरेक्टर तथा मुख्य प्रबन्धक से लेकर नीचे के निरीक्षकों तक सब मिलकर मैनेजमेंट या प्रबन्ध कहलाते हैं।

प्रबन्ध एक प्रक्रिया के रूप में- जब हम मैनेजमेंट या प्रबन्ध का भाव एक प्रक्रिया से मानते हैं तो उसमें वह सब सम्मिलित किया जाता है जो एक प्रबन्धक करता है। वह सब कार्य जो प्राप्त पदार्थक और मानवीय साधनों के प्रयोग के लिए, उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रबन्धक करते हैं, सब प्रबन्ध कहलाते हैं। इस प्रकार से नियोजन, संगठन कार्य, कर्मचारी भर्ती करना, निर्देशन, तालमेल पैदा करना तथा नियन्त्रण करने के सारे कार्य-प्रबन्ध में शामिल होते हैं।

अध्ययन विषय के रूप में कई बार प्रबन्ध का भाव न तो नाम या प्रक्रिया या वे कर्मचारी जो इसमें शामिल होते हैं अपितु ज्ञान, विज्ञान या व्यवहार का मिला-जुला रूप होता है। इससे हमारा भाव यह है कि प्रबन्ध सिद्धान्तों और व्यवहार अध्ययन का विषय है।

प्रबंधन की संकल्पना और परिभाषाएं

प्रबन्धन की संकल्पना का उपयोग कार्यात्मक मानव संबंधों, नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया, उत्पादकता और एकीकृत विज्ञानों में किया जाता है। भिन्न-भिन्न लेखकों द्वारा प्रबन्धन को विभिन्न संकल्पना के अनुसार परिभाषित किया गया है। उनकी संकल्पना के आधार पर प्रबन्धन की महत्त्वपूर्ण परिभाषाओं को निम्न रूप से वर्गीकृत किया जा सकता है:

1. कार्यात्मक संकल्पना : इस संकल्पना के अनुसार प्रबन्धन वह कार्य है जो किसी प्रबन्धक द्वारा किया जाता है।

(a) लॉज एलियन : “प्रबन्धन वह कार्य है जिसे प्रबन्धक किया करता है।”

(b) जेम्स एल. ल्यून्डी : “प्रबन्धन, मूलतः किसी निर्दिष्ट
उद्देश्य की दिशा में अन्यों के प्रयासों की आयोजना, उसे समन्वयित,अभिप्रेरित और नियंत्रित करना है प्रबन्धन वह कार्य है जिसे प्रबन्धक द्वारा किया जाता है। यह कार्य आयोजना, निष्पादन और नियंत्रण से संबंधित हुआ करता है।”

(c) हेनरी फेयोल : “पूर्वानुमान लगाना और आयोजना करना, संगठित करना, आदेश देना, समन्वय और नियंत्रित करना ही प्रबन्धन है।’

2. मानव संबंध संकल्पना : इस संकल्पना के अनुसार, प्रबन्ध एक कला है, जिससे हम अन्यों से कार्य करवा सकते हैं।

(a) हेराल्ड कून्ज : “औपचारिक रूप से संगठित समुह में लोगों के द्वारा और उनसे कार्य करवा लेने की कला ही प्रबन्धन है। यह उस वातावरण को सृजित करने को कला है जिसमें लोग कानिष्पादन कर सकते हैं और सामूहिक लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में सहयोग कर सकते हैं। यह ऐसे कार्यनिष्पादन में आने वाले अवरोध को रास्ते से हटाने कला है, लक्ष्यों तक पहुंचने में कुशलता को इष्टतम बनाने का उपाय।

(b) जे.डी. मूनी और रेली : लोगों को निर्देशित करने और उत्साहित करने की कला ही प्रबन्धन है।

3. नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया संकल्पना : इस संकल्पना केअनुसार निर्णय प्रक्रिया और नेतृत्व की कला और उसके विज्ञान को प्रबन्धन कहा जाता है।

(a) डोनाल्ड जे. क्लोफ : निर्णय प्रक्रिया और नेतृत्व की कला और उसका विज्ञान ही प्रबन्धन है।

(b) राल्फ सी. डेविस : किसी भी स्थान पर कार्यपालक नेतृत्व की कार्यविधि ही प्रबन्धन है।

(c) एफ. डब्ल्यू. टेलर : किसी स्थापना के सभी मामलों में पुराने व्यक्तिगत न्याय-निर्णय या राय के स्थान पर सटीक वैज्ञानिक अन्वेषण और ज्ञान के स्थानापन्न करना प्रबन्धन का अभिप्राय होता है।

4. उत्पादकता संकल्पना : इस संकल्पना के अनुसार उत्पादकता में वृद्धि की कला को प्रबन्धन का जाता है।

(a) जॉन एफ, मेकी “न्यूनतम प्रयास से अधिकतम समृद्धि की उपलब्धि को प्रबन्धन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है ताकि कर्मचारी और नियोजन-दोनों को ही अधिकतम समृद्धि और आनन्द की।प्राप्ति और जनता को श्रेष्ठतम संभव सेवा की उपलब्धि हो सके।”

(b) एफ. डब्ल्यू. टेलर : “प्रबन्धन यह ज्ञात करने की कला है कि आप उत्तम और सस्ते उपाय से क्या करना चाहते हैं।”

5. एकीकरण संकल्पना : इस एकीकरण संकल्पना के अनुसार प्रबन्धन को मानव और आपसी संसाधनों का समन्वयक कहा जा सकता है।

(a) कीथ एवं गुबलीनी : “प्रबन्धन वह बल है जो मनुष्य और भौतिक संयंत्र को प्रभावी प्रचालन इकाई के रूप में एकीकृत करता है।”

(b) रॉबर्ट एल. देवेथ एवं एम. जेन न्यूपोर्ट : उद्देश्यों की
प्रभावी और कुशल उपलब्धि में आवश्यक मानव एवं सामग्री संसाधनों के समन्वयन को प्रबंधन कहा जाता है।

निष्कर्षतया, प्रबन्धन को अन्तिम रूप से निम्नतया स्वीकार किया जा सकता है:


(a) आयोजनाओं, नीतियों और उद्देश्यों का रूपांकन;

(b) उनकी उपलब्धि के लिए मनुष्य, सामग्री, मशीनरी, धन और पद्धतियों का संग्रहण;

(c) इन सबको प्रचालनगत बनाना;

(d) कार्य पर मनुष्यों को निर्देशित और अभिप्रेरित करना;

(e)उनके कार्यनिष्पादन का पर्यवेक्षण और नियंत्रण करना; तथा नियोजक कर्मचारियों और आम जनता को अधिकतम संतुष्टि और सेवा प्रदान करना।

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