प्रबन्ध की विशेषता

प्रबन्ध के लक्षण व विशेषताएं

प्रबन्ध का मतलब अलग-अलग लेखकों के लिए इस तरह है जैसे अन्धे व्यक्तियों को हाथी अलग-अलग प्रकार का महसूस होता है। वे इस के विशेष अंग को अपने छूने के अनुसार मानते हैं। हर परिभाषा प्रबन्ध के एक विशेष पक्ष पर जोर देती है। ऊपर दी गई परिभाषाओं के विश्लेषण से प्रबन्ध के नीचे लिखे लक्षण प्रकट होते हैं-

  1. प्रबन्ध एक सामूहिक प्रक्रिया है- प्रबन्ध समूह प्रक्रिया का एक आवश्यक अंग है। क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को अपने आप पूरी नहीं कर सकता। इसलिए जो काम वह अकेला रह कर नहीं कर सकता वह अपने साथियों के साथ मिलकर कर लेता है। जब एक विशेष लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक संगठित समूह काम करता है तब किसी न किसी प्रकार का प्रबन्ध आवश्यक हो जाता है। प्रबन्ध लोगों को समूह के उद्देश्यों को याद करवाता है और उनके यत्नों की, उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अगवाई करता है। मैसी ने ठीक ही कहा है कि प्रबन्ध एक ‘सहकारी समूह’ है।

2. प्रबन्ध लक्ष्य मुखी है- प्रबन्ध का लक्ष्य आर्थिक और सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति है। इसका प्रयोग कुछ निश्चित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए होता है। प्रबन्ध के समूह के यत्न सदा ही पहले निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए होते हैं। इसका सम्बन्ध इन लक्ष्यों के निर्धारण और पूर्णता के साथ होता है।

3. प्रबन्ध उत्पादन का एक अंग है- प्रबन्ध सामूहिक उद्देश्यों की प्राप्ति का एक लक्ष्य ही नहीं बल्कि एक साधन है। जैसे ज़मीन, मजदूर और धन उत्पादन के अंश हैं और उत्पादन के लक्ष्य और सेवाओं के लिए आवश्यक हैं उसी प्रकार प्रबन्ध उत्पादन का अंश है जिसकी पहले से ही निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यकता है।

4. प्रबन्ध का क्षेत्र सर्वव्यापी- प्रबन्ध का भाव हर प्रकार का संगठन है। जब भी कभी मानवीय गतिविधि होती है तो प्रबन्ध की आवश्यकता पड़ती है। प्रबन्ध के सिद्धान्त सर्वव्यापी प्रयोग में लाने वाले हैं और हर प्रकार की गुटबन्दियों, कारोबारी, सामाजिक, धार्मिक, खेलों के बारे में, विद्या पर लागू होते हैं।

5.प्रबन्ध संस्था के हर पहलू में आवश्यक है- प्रबन्ध का अगला बड़ा लक्षण यह है कि संस्था के हर स्तर पर उसकी ज़रूरत पड़ती है। अर्थात् ऊपर वाली, बीच वाली या निरीक्षण स्तर पर इस की ज़रूरत पड़ती है। अन्तर केवल सत्ता के क्षेत्र और काम की प्रकृति का है। सबसे निचले स्तर पर निरीक्षक को भी उसी तरह के निर्णय करने हैं जिस तरह के ऊंचे स्तर पर प्रबन्धक को करने होते हैं।

6.प्रबन्ध एक अलग प्रक्रिया है- मानवीय और दूसरे साधनों का प्रयोग करके उद्देश्यों का निर्धारण करना और उनकी पूर्ति के लिए प्रबन्ध एक बढ़िया अमल है। यह गतिविधियों, विधियों तथा तकनीकों से अलग है। प्रबन्ध के प्रयोग में ऐसे कार्य जैसे योजनाबन्दी, गुटबन्दी, दिशा निर्धारण, उत्साहित करना, तालमेल करना, कर्मचारी प्रबन्ध और नियन्त्रण सम्मिलित हैं।

7.प्रबन्ध एक सामाजिक प्रक्रिया है- मैनेजमेंट या प्रबन्ध का अर्थ दूसरों द्वारा काम करवाना है। इसमें लोगों के साथ व्यवहार करना है। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए लोगों के कार्यों को प्रबन्धकों की तरफ से दिशा दिखाना, नियन्त्रण करना, तालमेल पैदा करना आदि काम करने पड़ते हैं। इन अर्थों में प्रबन्ध को एक सामाजिक प्रक्रिया कहा जाता है।

8.प्रबन्ध सत्ता की एक व्यवस्था है- चूँकि प्रबन्ध का मतलब व्यक्तियों को काम करने के लिए दिशा दिखाना है, इसलिए प्रबन्ध के संकल्प में दूसरों से काम करवाने की शक्ति का होना बहुत आवश्यक है। सत्ता का मतलब है, दूसरों से काम करवाने की सामर्थ्य और उन्हें एक खास ढंग से काम करने पर मजबूर करना। सत्ता के बिना प्रबन्ध कोई भी काम करने योग्य नहीं रहता।

9.प्रबन्ध एक गतिशील कार्य है- प्रबन्ध एक गतिशील कार्य है और यह लगातार करना पड़ता है। यह हमेशा बदली हुई व्यापारिक हालतों के अनुसार अपने आयु को ढालने के लिए लगातार कार्यशील रहता है। इसका सम्बन्ध केवल कारोबार ढालने के साथ ही नहीं है बल्कि वातावरण को बदलने का यत्न भी करना है ताकि कारोबार सफल हो सके। वास्तव में तो यह कभी समाप्त न होने वाला कार्य है।

10.प्रबन्ध एक कला भी है और विज्ञान भी- प्रबन्ध एक विज्ञान है क्योंकि इस में कुछ ऐसे नियमों का विकास हुआ है, जिनका प्रयोग विश्व भर में हो रहा है पर प्रबन्ध का प्रयोग वर्तमान प्रबन्धक की व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करता है। इन अर्थों में विज्ञान एक कला है। प्रबन्ध के विज्ञान के प्रयोग के लिए प्रबन्धक की कला आवश्यक है। इस तरह से प्रबन्ध विज्ञान भी है और कला भी।

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