मानव संसाधन के प्रमुख घटक

HRM का अध्ययन क्यो करे?

लोगों को देखना एक पुरस्कार देने वाला अनुभव होता है। यह लोग हैं जिनमें वे कुशलताएं, क्षमताएं तथा अभिरुचियाँ होती हैं जो एक फर्म को प्रतियोगी लाभ प्रदान करती हैं। यह सिर्फ मानव संसाधन है जो गतिविधियों को तय करने, क्रियान्वित करने तथा नियंत्रित करने में सक्षम है। कोई कम्प्यूटर मानव मस्तिष्क को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता,कोई मशीनें मानवीय हस्तक्षेप के बिना नहीं चल सकतीं तथा कोई संगठन बना नहीं रह सकता यदि यह लोगों की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता। HRM संगठनों में लोगों के बारे में एक अध्ययन है उनकी कैसे भर्ती, प्रशिक्षण, क्षतिपूर्ति, अभिप्रेरणा तथा अनुरक्षण किया जाता है। एक कारखाना भगवान द्वारा नहीं बनाया जाता बल्कि मानवों द्वारा बनाया जाता है। लोग कारखानों को निर्मित करते हैं, संगठनों की संरचना बनाते हैं तथा उन्हें सफलतापूर्वक प्रबंधित करते हैं। एक विचार एक उद्यमी द्वारा कैसे पैदा किया जाता है, भवन कैसे निर्मित तथा मशीनरी कैसे स्थापित की जाती है, कैसे चाहे गए इनपुटों को संभाला जाता व प्रयोग किया जाता है तथा वस्तुएं तथा सेवाएं कैसे उत्पादित की जाती हैं, यह विषय है जो एक युद्ध में एक सेना को विजय दिलवाने वाले एक वैज्ञानिक द्वारा किए गए एक आविष्कार या AIDS जैसे बीमारी का उपचार करने के लिए पाई गई एक रेमेडी से कम मजेदार व उत्साही नहीं होगा। HRM संगठनों में लोगों के बारे में एक विस्तृत चित्र प्रस्तावित करता है।

व्यावसायिक संगठन में मानव संसाधन प्रबंध
का स्थान तथा महत्त्व –

पिछली दो शताब्दियों के दौरान तीव्र औद्योगिक विकास के कारण, एक नई औद्योगिक संस्कृति के साथ एक नया औद्योगिक विश्व उभरा है। इसके अनुसार, मानवशक्ति का इसके महत्त्व के अनुसार कोई स्थान नहीं है लेकिन भौतिक संसाधनों को एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है एवं इसलिए श्रम संबंधों ने नया टर्न लिया है। हर दिन नई श्रम समस्याएं उठाई जाती हैं तथा प्रबंध को उनका हल पाना होता है। मानव संसाधन प्रबंध का बहुत महत्त्व का स्थान है। पीटर एफ. ड्रकर के अनुसार, ‘उत्पादन के विभिन्न कारकों का उचित या अनुचित प्रयोग मानव संसाधनों की इच्छाओं पर निर्भर होता है। अत: अन्य संसाधनों के अलावा मानव संसाधनों को ज्यादा विकास की जरूरत होती है। मानव संसाधन सहयोग को बढ़ा सकते है लेकिन इसे निर्देशित करने के लिए उचित तथा सक्षम प्रबंध की जरूरत होती है। कुछ विद्वानों ने मानव मस्तिष्क की तुलना मानव संसाधन प्रबंध के साथ की है। जिस तरह मस्तिष्क मानव शरीर के सभी भागों को निर्देशित करता है तथा इसकी बीमारी के कारण शरीर के सर्वश्रेष्ठ भाग निष्क्रिय हो जाते हैं। इसी तरह एक सक्षम मानव संसाधन प्रबंध पूरे सेविवर्ग से कार्य लेता है व उद्देश्य को प्राप्त करता है। लारेंस ए. एप्पले ने बताया है कि यदि प्रबंध इस सत्य से सहमत हो जाता है कि प्रबंध का अर्थ सेविवर्ग का विकास है तथा मानव संसाधनों के विकास पर उचित तरह से ध्यान देता है, तब प्रबंध से संबंधित कई समस्याएं स्वयं हल हो जाएंगी तथा कई परेशानियाँ उत्पन्न नहीं होंगी। आर.एम. एल्ड्चि सेविवर्गीय या मानव संसाधन प्रबंध को नर्वस प्रणाली बोलता है अर्थात् स्वयं प्रबंध की प्रक्रिया का एक एकीकृत भाग। सेविवर्गीय प्रबंध का महत्त्व वास्तव में सेविवर्गीय विभाग के श्रम कार्यों का महत्त्व है जो स्वयं प्रबंध गतिविधि के लिए अपरिहार्य है।

निम्न कारणों से मानव संसाधन प्रबंध महत्त्व के स्थान को धारित करता है-

1.यह प्रबंध की सेविवर्गीय प्रोग्रामों तथा नीतियों के निर्माण,अपनाने तथा निरंतर मूल्यांकन में सहायता करता है।

2.यह वैज्ञानिक चयन प्रक्रिया के द्वारा कुशल श्रमिकों की पूर्ति करता है।

3.यह प्रशिक्षण तथा विकास पर व्यय में से अधिकतम लाभ को सुनिश्चित करता है व मानव संपत्ति का मूल्य बढ़ाता है।

4.यह श्रमिकों को उद्योग तथा पर्यावरण की बदलती जरूरतों के अनुसार तैयार करता है। यह श्रमिकों को अभिप्रेरित करता है एवं उन्हें अपग्रेड करता है ताकि वे संगठन के लक्ष्यों को पूरा कर सकें।

5.यह श्रमिको को अभिप्रेरित करता है तथा अपग्रेड करता है ताकि लक्ष्य को पूरा कर सके।

6.सेविवर्ग के क्षेत्र में नवप्रवर्तन तथा प्रयोगीकरण के द्वारा, यह लागतों को कम करने में सहायता करता है तथा उत्पादकता को बढ़ाने में सहायता करता है।

7.यह औद्योगिक सजातीयता तथा स्वास्थ्यप्रद नियोजक कर्मचारी संबंधों को बनाए रखने में बहुत योगदान देता है। यह सेविवर्गीय सेवाओं के प्रशासन के लिए यंत्रावली को स्थापित करता है जो सेविवर्गीय विभाग को भारापित की जाती है।

8.अत: मानव संसाधन प्रबंध या सेविवर्गीय विभाग की भूमिका एक संगठन में बहुत महत्त्वपूर्ण होती है तथा इसे विशेषकर बड़े स्तर के संस्थानों में कम करके नहीं आंका जाना चाहिए यह पूरे संगठन की कुंजी होता है तथा प्रबंध की सभी अन्य गतिविधियों अर्थात् विपणन,उत्पादन, वित्त आदि से संबंधित होता है।
कर्मचारी प्रबन्धक की भूमिका कर्मचारी प्रबन्धक की भूमिका संगठन की दैनिक कार्य प्रणाली पर.निर्भर करती है। इसे संक्षेप में इस तरह समझा जा सकता है-

  • एक विशेषज्ञ के रूप में मानव संसाधन प्रबन्धक को विशेषज्ञ माना जाता है। वह विभिन्न विभागों जैसे-योजना, भर्ती, चयन तथा प्रशिक्षण के विभाग प्रमुखों को सलाह देता है। उसे इन प्रमुखों का विश्वास तथा आस्था प्राप्त होनी चाहिए

  • नियंत्रणकर्ता-मानव संसाधन प्रबन्धक नियंत्रण प्रक्रिया हेतु जरूरी है। उसे यह सुनिश्चित करना होता है कि सभी नीतियाँ तथा प्रक्रियाएं उचित रूप से पूरी हों।

  • सूचना का स्रोत-वह श्रम कानून तथा अन्य सम्बन्धित मामलों
    के बारे में जानकारी रखता है एवं महत्त्वपूर्ण सूचनाएं उपलब्ध कराता है।

ये सूचनाएं नीति निर्माण तथा प्रक्रियाएं तय करने में आवश्यक होती हैं।इस तरह मानव संसाधन प्रबन्धक संगठन की जरूरत के अनुसार विभिन्न भूमिकाएं निभाता है। वह प्रबन्धन एवं कर्मचारियों के बीच सेतु का कार्य करता है। वह मानव सम्बन्ध सम्बन्धी दिक्कतें भी दूर करता है।वह निर्णय लेने वाले से ज्यादा सलाहकार है। कर्मचारी के कार्यों तथा प्रदर्शन को मार्गदर्शन प्रदान करता है और आवश्यक सुझाव देता है।

प्रदशन का मागदर कर्मचारी प्रबन्धक के गुण कर्मचारी प्रबन्धक-प्रबन्धक टीम का एक महत्त्वपूर्ण सदस्य है।
प्रौद्योगिकी के विकास के साथ ही उसकी भूमिका चुनौती पूर्ण हो गई है।उसे अपने क्षेत्र का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए। इसके अतिरिक्त तर्क,गणित, समाजशास्त्र तथा प्रबन्धन का भी ज्ञान होना जरूरी है। इससे उसेमानव स्वभाव को समझने, सीमित संसाधनों का उचित उपयोग करनेतथा नेतृत्व करने में जरूरी मदद प्राप्त होगी।

एक सफल कर्मचारी प्रबन्धक में निम्नानुसार गुण होने चाहिए-

  1. नेतृत्व-इसमें नेतृत्व क्षमता होना चाहिए। उसे विरोध सहने हेतु
    भी तैयार रहना चाहिए। वह निर्भीक होकर बोलने वाला हो। कर्मचारियों का विश्वास प्राप्त करने की उसमें योग्यता होना चाहिए।
  2. सम्प्रेषण कौशल-उसका भाषा पर अधिकार होना चाहिए ताकि वह सही ढंग से अपनी बात रख सके। कर्मचारी प्रबन्धक को नीति तथा कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से पेश करना पड़ता है।
  3. सामाजिक जिम्मेदारी-एक संगठन समाज का हिस्सा है। उसकी विभिन्न समूहों जैसे-अंशधारकों, उपभोक्ताओं, श्रमिकों, आपूर्तिकर्ताओं तथा शासन के प्रति जिम्मेदारी होती है। कर्मचारी प्रबन्धक में सामाजिक उत्तरदायित्व को भावना होना चाहिए ताकि यह संगठन की तरफ से इस जिम्मेदारी का निर्वाह कर सके।
  4. प्रशिक्षण तथा अनुभव-मानव संसाधन हेतु प्रशिक्षण का बड़ा महत्त्व है। अनुभव से वह संगठन का सफल प्रबन्धक सिद्ध होता है।
  5. विनम्रता- मानव संसाधन प्रबन्धक को कई वर्ग तथा स्तर के लोगों से बात करना होती है। वह ट्रेड यूनियन के नेता तथा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर से भी चर्चा करता है। इसके लिए उसमें विनामता तथा सामाजिक सजगता होना अनिवार्य है।
  6. व्यक्तिगत गरिमा कर्मचारी प्रबन्धक को श्रमिकों से बातचीत करना पड़ती है। इस प्रकार उसका काम स्वयं उससे भी बड़ा होता है। अतः मानव संसाधन प्रबन्धक को समाज शास्त्र, प्रबन्धन, दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा कानून जैसे विषयों का ज्ञान होना चाहिए।इसके लिए तकनीकी और प्रशासनिक कौशल अनिवार्य है।

एक सफल सेविवर्गीय प्रबंधक में एक प्रबंधक के सभी गुण होने चाहिए तथा इसके अतिरिक्त उसमें निम्न गुण भी होने चाहिए

  1. उत्साह, धैर्य, समयबद्धता तथा निर्णय। उसे उसके
    अंतर्गत काम कर रहे लोगों में उत्साह पैदा करने में सक्षम होना चाहिए।

उसे उचित समय पर निर्णय लेने में सक्षम होना चाहिए। कठिनाइयों के समय पर उसमें पर्याप्त धैर्य होना चाहिए। उसे अभिप्रेरणा की जरूरतों तथा विधियों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए।

  1. अन्य विभागों के साथ सहयोग : उसका अन्य विभागों के
    साथ नजदीकी व घनिष्ठ संबंध होना चाहिए। सहयोगी कार्य में उसके साथियों के साथ उनकी परेशानियों तथा विभिन्न समस्याओं, चुने उम्मीदवादों के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं को समझने के लिए समय-समय पर मिलना शामिल होता है। सिर्फ इस तरीके से अभिप्रेरणा को ठोस सेविवर्गीय नीति के द्वारा बढ़ाया जा सकता है जो कठोर नहीं होनी चाहिए बल्कि उसमें परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर परिवर्तन होना चाहिए।
  2. वस्तुनिष्ठ तरीके से सोचना : उसका उसके कार्य के उद्देश्यों
    के बारे में स्पष्ट विचार होना चाहिए। इस प्रयोजन के लिए उसे उसके स्वयं के स्टाफ के प्रशिक्षण के प्रोग्रामों को लागू करवाने में सक्षम होना चाहिए। कर्तव्यों के केन्द्रीयकरण की जगह, सेविवर्ग तथा कार्य की क्षमता को बढ़ाने के लिए प्राधिकारों को दूसरों को भारपित किया जाना चाहिए।
  3. कंपनी के प्रति वफादारी : उसे कंपनी तथा इसकी मूलभूत नीतियों के प्रति वफादार रहना चाहिए। जब वह किसी विशिष्ट नीति से सहमत नहीं होता जो उस पर थोपी गई हैं तब भी उसे उसकी असहमति व दृष्टिकोण को उसके वरिष्ठों को नम्र शब्दों में व्यक्त करके एक अनुशासित सिपाही की तरह काम जारी रखना चाहिए।

5. सहानुभूतिपूर्ण : एक अच्छे सेविवर्गीय प्रबंधक में उसके अतर्गत काम करने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति बहुत सहानुभूतिपूर्ण होने का गुण होता है। इसका अर्थ दिन प्रतिदिन के काम में रूदिन कार्य को क्रियान्वित करने व निर्देशों का पालन करने में कोई कमजोरी का नहीं होता।

इसके अतिरिक्त, अन्य महत्त्वपूर्ण गुण जो एक सेविवर्गीय प्रबंधक में होने चाहिए, वे निम्न प्रकार हैं-

(i) उसमें सृजनात्मक चिंतन की क्षमता वाला दिमाग होना चाहिए।

(ii)उसे समस्या समाधान तकनीकों को जानना चाहिए तथा कर्मचारियों को प्रेरित, अभिप्रेरित तथा निर्देशित करने की क्षमता होनी चाहिए।

(iii)उसमें व्यक्तिगत अखंडता होनी चाहिए ताकि कर्मचारियों को उसमें भरोसा हो।

(iv) उसमें अच्छे से विकसित व्यक्तित्व तथा परिष्कृत पसंद तथा आदतें होनी चाहिए।

(v)उसमें उसके साथियों में विश्वास उत्पन्न करने की क्षमता होनी
चाहिए।

(vi) उसमें उसके विचारों को त्वरितता तथा विश्वास से प्रदर्शित करने की क्षमता होनी चाहिए।

(vii) उसमें एक अच्छे नेता के सभी गुण होने चाहिए।

(viii) उसमें स्वयं के लिए मान्यता निर्मित करने की क्षमता होनी
चाहिए।

(ix) उसमें जब भी जरूरी हो, गंभीर सेविवर्गीय मामलों को हैंडल करने के लिए जरूरी क्षमता होनी चाहिए।

(x) उसे दिक्कतों के समय पर उसके मातहतों के साथ सहयोग करने के लिए तैयार होना चाहिए।

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