मार्केटिंग के दर्शन

विपणन-प्रबन्धन विपणन-परिकल्पना के क्रियाशील रूप का द्योतक है अर्थात् ग्राहकोन्मुख विपणन-दर्शन के अनुरूप पूर्व निर्धारित माँग का प्रबन्धन। विपणन प्रबन्ध को परिभाषित करते हुए कह सकते हैं कि इससे अभिप्राय ऐसे विपणन कार्यक्रमों के प्रबन्ध से है जिनके द्वारा संस्था के लक्ष्यों को पाया जा सकता है। यह ग्राहकों को संतोष प्रदान करने के महत्त्वपूर्ण एवं सृजनात्मक क्रिया-कलापों का प्रबन्धन है जिसके परिणामस्वरूप ग्राहकों की माँग बढ़ती है और मुनाफे में भी वृद्धि होती है। अमेरिकी मार्केट एसोसिएशन (AMA) द्वारा 1985 में दी गई परिभाषा है,“विपणन (प्रबन्धन) उत्पाद वस्तुओं विचारों और सेवाओं की परिकल्पना, मूल्य- निर्धारित, प्रोत्साहन तथा बाँटना की प्रक्रिया है जो कि संभावित वर्गों में एक दूसरे को संभव बनाती है और ग्राहकों तथा कम्पनी के लक्ष्यों की पूर्ति में सहायक है।” इस परिभाषा के अनुसार विपणन प्रबन्धन विश्लेषण, विनियोजन, कार्य पर आधारित प्रक्रिया है, इसमें वस्तुओं, सेवाओं और विचारों को गिना गया है, यह विनिमय की अवधारणा पर आश्रित है और इसका लक्ष्य संबद्ध पक्षों का संतोष है।

मार्केटिंग-प्रबन्ध स्प निम्न कार्य करता है-

1.विपणन के लक्ष्यों को निर्धारित करना
2.विपणन नियोजनाओं का विकास करना
3.विपणन के क्रिया-कलापों को व्यवस्थित करना।
4.विपणन योजना को कार्यरूप देना
5.विपणन कार्यक्रमों पर नियन्त्रण रखना।

विपणन प्रबन्ध के उद्देश्य:-

विपणन प्रबन्धन मुख्य रूप में उन कार्यों से सम्बन्धित है जो ग्राहकों की आवश्यकताओं तथा इच्छाओं को सन्तुष्ट करके लम्बे समय के लिए लाभपूर्ण स्थिति की ओर ले जाते हैं।

यद्यपि विपणन प्रबन्धन के मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित हैं-

1. नये प्राहक बनाना तथा उन्हें कम्पनी की वस्तुओं तथा
सेवाओं की ओर प्रोत्साहन-मिश्रण द्वारा आकर्षित करना।

2. आधुनिक विपणन में विपणन की प्रत्येक क्रिया प्राहकों की पसन्द के गिर्द घूमती है। इसलिए, केवल वस्तुओं तथा सेवाओं का क्रय ही पर्याप्त नहीं, परन्तु उपभोक्ता की सन्तुष्टि अधिक महत्त्वपूर्ण है।

3. विपणन के 4P अर्थात् विपणन मिश्रण का नियोजन इस तरीके से किया जाना चाहिए कि सभी ग्राहकों की भिन्न जरूरतें पूरी हो सकें।

4. व्यवसाय की वृद्धि तथा बाजार में बने रहने के लिए
पर्याप्त लाभ निर्मित करना।

5.छवि निर्यात गतिविधियों जैसे विक्रय संवर्धन, प्रचार तथा विज्ञापन, उच्च गुणवत्ता उत्पाद, उचित मूल्य आदि को प्रारंभ करके व्यवसाय की ख्याति को निर्मित करना। यह लोगों के जीवन स्तर को उठाने में भी सहायता करती हैं।

विपणन की प्रकृति:-

स्टैन्टन के अनुसार, “मार्केटिंग जीवन स्तर का सर्जन एवं
वितरण है; यह ग्राहकों की इच्छाओं का पता लगाता है तब ऐसे उत्पाद अथवा सेवा की योजना बना कर उसका विकास करता है जिससे ग्राहक की वह इच्छाएं पूरी हों। तब उस वस्तु की कीमत, प्रोत्साहन एवं वितरण का उत्तम उपाय निर्धारित करता है।” प्रभावशाली विपणन प्रबन्धन में उच्च कोटि की योग्यता एवं प्रवीणता का होना आवश्यक है विपणन प्रबन्धन का मुख्य लक्ष्य उपभोक्ता को इतनी अच्छी प्रकार जानना है कि फर्म उपभोक्ता को ऐसी वस्तुएं तथा सेवाएं भेंट करे कि वह हमेशा निष्ठावान रहे एवं नये उपभोक्ताओं का बढ़-चढ़ कर आगमन बना रहे।

विपणन प्रबन्धन के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं-

1.विपणन व्यापार का एक विशिष्टीकृत कार्य है शुरू के दिनों में विक्रय कार्य हेतु विशिष्ट प्रवीणताओं की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि विक्रय उत्पादन आधार पर प्रभावित हो सकते थे। परन्तु अब व्यापार का वातावरण सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में बहुत बदल गया है। इसलिए एक फर्म के प्रबन्धकों को नये विचारों, नई परिकल्पनाओं एवं बाज़ार की नई माँगों को अंतविलीन करने हेतु एक विशेष संस्था विकसित करनी पड़ी है।

2.विपणन एक सामाजिक कार्य है। इसमें समाज के भिन्न-भिन्न स्तरों पर लगातार पारस्परिक कार्य करना पड़ता है। यह उत्पादन के साधनों का, वितरण, प्रोत्साहन, कीमत एवं उपभोग की धारणाओं तथा उपभोक्ता के विचार-भावों का जोड़-तोड़ करने में सहायक होता है।

3.विपणन एक अविभाज्य कार्य है। यह संस्थात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु व्यापार के अन्य कार्यों जैसे उत्पादन, वित्त, कर्मचारी वर्ग,शोध एवं विकास विभागों आदि को जोड़ता है तथा इकट्ठे रखता है।विपणन जनता एवं समाज के सामने कम्पनी के लक्ष्य प्रतिबिम्बित करता है।

4.कहा जाता है कि अर्थशास्त्र का सिर्फ एक ही मौलिक
नियम है ‘परिवर्तन’। इसी तरह विपणन जो कि विभिन्न दावेदारों के बीच उत्पाद एवं सेवाएं वितरण करने की कला है का भी एक मौलिक नियम है ‘परिवर्तन’।

5.विपणन एक सार्वभौमिक कार्य है। सार्वभौमिक इसलिए क्योंकि यह लाभ-लक्षित तथा गैर लाभ-लक्षित सभी संस्थाओं पर लागू होता है। एक लाभ-खोजी व्यापारिक संस्था विपणन पर निर्भर करती है। गैर लाभ-लक्षित संस्थाएं जैसे चिकित्सालय, पाठशालाएं, विश्वविद्यालय एवं राजनैतिक संघ भी अपनी सेवाओं को लोकप्रिय बनाने हेतु विपणन का प्रयोग करते हैं।

6.विपणन एक प्रबन्धन कार्य है। जैसे अन्य कार्यों का
प्रबन्धन यथा उत्पाद प्रबन्धन, वित्त प्रबन्धन, कर्मचारी वर्ग का प्रबन्धन आदि। विपणन से सम्बन्धित व्यापारिक नीतियाँ, दाँव पेच एवं कार्यक्रम प्रायः प्रबन्धन सम्बन्धी कार्य हैं।

7.अनुसंधान एवं विकास द्वारा विपणन, अभियन्ता,
अभिकल्पक तथा निर्माता के लिए यह निश्चित करता है कि यह उत्पाद में ग्राहक क्या चाहता है, इसके मूल्य के रूप में वह क्या देना चाहेगा तथा कहाँ और कब इस उत्पाद की आवश्यकता है। विपणन को उत्पाद की खोज एवं योजना, उत्पादन कार्यक्रम के साथ-साथ विक्रय, वितरण तथा उत्पाद को उचित सेवा प्रदान करने पर प्राधिकार प्राप्त है।

8.विपणन विज्ञान भी है और कला भी। यह मानवीय
प्रकृति ही की तरह एक जटिल प्रतिभास है। उत्तम परिणाम प्राप्त करने के लिए विपणन में विज्ञान एवं कला दोनों ही के नियम लागू होते हैं।

9. विपणन एक व्यवस्था है जिसमें कई परस्पर-निर्भर एवं परस्पर-क्रियाशील उपव्यवस्थाएं हैं। इसमें कार्यों की एक श्रेणी शामिल होती है जो परस्पर सम्बन्धित होते हैं। यह पर्यावरण से आगत प्राप्त करता है एवं ग्राहक सन्तुष्टि द्वारा इसे लाभों के रूप में, उत्पादन में परिवर्तित करता है। यह व्यापार के वातावरण में होने वाले परिवर्तनों को सन्तुलित करता रहता है।

विपणन का महत्त्व :-

विपणन कार्य निम्न योगदान के कारण महत्वपूर्ण माना जाता है:-

1.विपणन की परिकल्पना संस्थाओं को परिवर्तनों के प्रति सुचेत रखती है। एक संस्था जो परिकल्पना का प्रयोग कर रही है, लगातार विपणन के लेखा परीक्षण, बाजार की खोज एवं उपभोक्ता परीक्षण द्वारा बाजार का पूर्ण ज्ञान रखती है।

2.विपणन परिकल्पना का लक्ष्य है उपभोक्ता की सन्तुष्टि। यह उपभोक्ता ही है जो वस्तु तथा सेवाओं की कीमत चुकाने को तैयार है, आर्थिक साधनों को धन में एवं चीजों को वस्तुओं में बदलता है। सभी आर्थिक क्रियाएं जैसे कि उत्पादन, वितरण एवं उपभोग विपणन पर निर्भर है।

3. विपणन परिकल्पना का एक और विशिष्ट गुण है संगठित.प्रबन्धन कार्य। इसका अर्थ है कि व्यापार सम्बन्धी सभी भिन्न-भिन्न कार्य आवश्यक रूप से परस्पर सुसंगठित हों जिनका केन्द्र बिन्दु विपणन हो।

4.एक योग्य विपणन का ढाँचा विक्रय की मात्रा बढ़ाता है एवं इस तरह उत्पादों तथा सेवाओं के वितरण की लागत को कम करता है।

5. एक विपणन कार्य, वर्तमान एवं संभावित उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं के बारे में जानने के लिए उनसे लगातार तालमेल बनाये रखता है।

6. मार्केटिंग का एक सहायता के साधन के रूप में दर्शया गया है जो एक व्यक्ति की समाज के सदस्य के रूप में सहायता करता है एवं समस्त समाज को एक अच्छा जीवन स्तर प्रदान करने का साधन भी माना गया है।

7. यह विभिन्न क्रियाओं जैसे भण्डारण, बीमा, परिवहन
आदि के लिए संरचना प्रदान करता है जिस कारण से रोज़गार के अवसरों में वृद्धि होती है।

भारत के विशाल ग्रामीण क्षेत्र विपणन के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करते हैं। कुल जनसंख्या के 80 प्रतिशत के समीप लोग गाँवों में रहते हैं। 50 प्रतिशत से अधिक राष्ट्रीय आय ग्रामीण क्षेत्रों से उत्पन्न होती है। विपणन ने ग्रामीण क्षेत्रों में अभी तक अधिक उन्नति नहीं की है। इसलिए विपणन से अपेक्षा की जाती है कि यह ग्रामीण लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठाने हेतु अधिक से अधिक वस्तुएं प्रदान करने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेगा।

यद्यपि, विपणन के आधुनिक काल में, विपणन का लक्ष्य एक फर्म द्वारा उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए ग्राहक ढूँढ़ना इतना नहीं है जितना कि ऐसे रास्ते खोजना है जिन द्वारा सम्भावित ग्राहकों की आवश्यकताएं पूरा करने तथा अधिक से अधिक लाभ कमाने हेतु फर्म के साधनों का प्रयोग किया जा सके। विपणन, व्यापार में लगे प्रत्येक व्यक्ति की क्रियाओं तथा निर्णयों का मार्ग दर्शन करता है। इसे व्यापार की आखें एवं कान कहा जाता है क्योंकि यह व्यापार का इसके वातावरण से घनिष्टसम्बन्ध बनाये रखता है एवं ऐसी घटनाओं के सम्बन्ध में बताता है जो इसके कार्यों को प्रभावित कर सकती है।

जैसे कि हम जानते हैं कि सभी उत्पादनों का अन्त उपभोग है।परन्तु उत्पादन एवं उपयोग के मध्य एक विस्तृत अन्तर है। उत्पादन का स्थान उपभोग बिन्दु से बहुत दूर है। इस प्रकार उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं तथा इच्छाओं की सन्तुष्टि हेतु वस्तुएं ठीक अवस्था में, ठीक समय पर, ठीक स्थान पर तथा ठीक ढंग से उपलब्ध होनी चाहिए।

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