व्यक्तिगत निर्धारक

व्यक्तित्व के निर्धारक कारक

व्यक्तित्व का अर्थ समझ लेने के उपरांत अब प्रश्न यह है कि ऐसे कौनसे निर्धारक तत्त्व हैं जो व्यक्तित्व की सृष्टि किया करते हैं? क्या व्यक्तित्व का निर्धारण जन्मजात हुआ करता है अथवा क्या बाद में अपने वातावरण के साथ प्रतिक्रिया करके उसमें यह विकसित होता है? सामान्य तौर पर इन प्रश्नों के उत्तर में सहमति यह बनी है कि वंशानुगत विरासत और वातावरण दोनों ही मिलकर व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित किया करते हैं। व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करने वाले तत्त्वों पर निम्नवत रूप से प्रकाश डाला जा रहा है।

(A) विरासत : यह चिरस्थाई विचार है कि व्यक्तित्व तो
विरासत में ही मिला करता है। अपनी दैनिक बातचीत में हम अक्सर यह दुहराया करते हैं कि “जैसा पिता वैसा बेटा” या फिर “जैसी माँ वैसी बेटी” जब हम इन मुहावरों का उपयोग करते हैं तो हमारा अभिप्राय शरीर के आकार-स्वरूप, आंख की पुतलियों के रंग, बाल के रंग, कद, तुनकमिजाजी, ऊर्जा-स्तर, बुद्धिमत्ता, अभिव्यक्ति आदि से होता है। हालांकि विरासत का महत्त्व किसी एक व्यक्तित्व-गुण से अन्य गुण में भिन्नता लिए होता है। उदाहरणस्वरूप, किसी व्यक्ति की चित्त प्रकृति में मूल्यों और आदर्शों की अपेक्षा उसकी विरासती प्रकृति अधिक महत्त्वपूर्ण हुआ करती है।

एस.पी. रॉबिन्स के अनुसार, “विरासती अवधारणा का आग्रह है कि क्रोमोसोमों में स्थित जीनों की परमाणविक संरचना में ही किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की तत्त्वात्मक व्याख्या निहित होती है। अनुसंधान की तीन विभिन्न शाखाओं ने इस तर्क को विश्वसनीयता प्रदान की है कि किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्धारण में विरासती आनुवंशिकी का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। इसमें से प्रथम में छोटे बच्चों के मानवीय व्यवहार और चित्त प्रकृति में देखा गया। द्वितीय अनुसंधान में समयोपरांत और स्थितियों के आरपार कार्यसंतुष्टि में अनवरत निरंतरता की परीक्षा की गई।

(B) वातावरण : व्यक्तित्व की चित्त-प्रकृति यदि विरासती वंशानुगत तय हो तो उन्हें जन्मजात होना चाहिए और आजीवन उनमें कोई फेरबदल नहीं होना चाहिए। किन्तु ऐसा होता ही नहीं। व्यक्तित्व की चित्त-प्रकृति को विरासती स्वरूप नहीं माना जा सकता, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में वातावरण की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका हुआ करती है। इस वातावरण में संस्कृति, परिवार, समाज और स्थितिगत तत्त्व शामिल होते हैं, यथा:

1. संस्कृति : हाबेल के अनुसार, “संस्कृति सीखी गई उन व्यावहारिक चित्त-प्रकृतियों का समूह है, जो समाज के सदस्यों द्वारा अभिव्यक्त और आपस में बाँटी जाती है।”

संस्कृति में वे मानदण्ड, मनोवृत्तियाँ और मूल्य निर्धारित किए जाते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी यथावत बने रहते हैं। प्रत्येक संस्कृति अपने सदस्यों से प्रत्याशा करती है और उन्हें प्रशिक्षित करती है कि वे ऐसा व्यवहार ही करें जो उनके समूह को स्वीकार योग्य हो। विभिन्न सांस्कृतिक समूहों के लोगों के मन में स्वाधीनता, आक्रमण, प्रतिस्पर्धा, सहयोगिता, कलात्मक रुचि, आदि के संबंध में भिन्न-भिन्न मनोवृत्ति हुआ करती है। एक बच्चा अपने बचपन से गुजरते हुए अपने परिवार से अपनी संस्कृति के अनुरूप व्यवहार करना सीखता है। अधिकतर संस्कृतियों में महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों से विभिन्न भूमिकाओं की अपेक्षा की जाती है। इसी तरह प्रत्येक संस्कृति में उसकी अपनी उप-संस्कृतियाँ हुआ करती है जिनमें नीतिपरक मूल्यों, वस्त्र परिधान के तौर-तरीके आदि में विभिन्नता पाई जाती है।

व्यक्तित्व विकास पर यद्यपि संस्कृति का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पउता है, फिर भी निम्नवत कारणों से संस्कृति और व्यक्तित्व के बीच सीधा संबंध नहीं जोड़ा जा सकता

(1)किसी भी संस्कृति में अनेक उप-संस्कृतियों का अस्तित्व होने के कारण से उस मूल संस्कृति के व्यक्तियों के व्यवहार और व्यक्तित्व में एकरूपता का हो पाना संभव नहीं है।

(ii)प्रबंधकगण जिस संस्कृति से प्रभावित होते हैं, ठीक उसी संस्कृति से श्रमिकगण प्रभावित नहीं हुआ करते। फिर अदक्ष श्रमिकों की तुलना में दक्ष श्रमिकों की व्यावहारिक रूपरेखा भिन्न प्रकृति की हुआ करती है।

प्रबंधन को अपने संगठन के लोगों के साथ व्यवहार-पालन के दौरान इन भिन्नताओं की पहचान और समझ करनी चाहिए।

2. परिवार : किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के महत्त्वपूर्ण निर्धारकों में से एक उसका अपना परिवार ही होता है। परिवार द्वारा व्यक्ति को बचपन से ही प्रभावित किया जाता है। ऐसे प्रभाव की प्रकृति निम्नवत तत्त्वों पर निर्भर किया करती है:

(i)  परिवार का सामाजिक आर्थिक स्तर
(ii)  परिवार का आकार-स्वरूप
(iii) जन्मक्रम
(iv)  प्रजाति
(v)   धर्म
(vi)  माता-पिता का शैक्षणिक स्तर
(vii) भौगोलिक स्थिति

उक्त तथ्य को स्पष्ट करने के लिए कहा जा सकता है कि किसी गरीब घर के बच्चे की तुलना में एक धनी और प्रतिष्ठित परिवार में लालन-पालन पाने वाले बच्चे का व्यक्तित्व निश्चित तौर पर भिन्न होगा। इसी तरह परिवार के आकार-स्वरूप का प्रभाव भी बच्चे के व्यवहारगत व्यक्तित्व के गठन निर्माण पर पड़ा करता है। दो से अधिक भाई-बहन की अपेक्षा परिवार में एक ही बच्चा होने पर उसका व्यक्तित्व भिन्न प्रकृति से विकसित हुआ करता है। इसी तरह केवल माँ-बाप के साथ रहकर बड़े होने वाले बच्चे का व्यक्तित्व उस बच्चे के व्यक्तित्व से भिन्न होगा जो संयुक्त परिवार के लालन-पोषण में पलता है। विभिन्न अध्ययनों से यह भी ज्ञात हुआ है कि परिवार में सबसे पहले जन्मा बच्चा अधिक जिम्मेदार, युक्तिपूर्ण स्वतंत्र, अभिलाषापूर्ण और सामाजिक स्वीकार्यता के प्रति अधिक संवेदनशील होता है। अनुभवजन्य साक्ष्य भी यह प्रकट करते हैं कि माँ और पिता द्वारा सृजित घर और परिवार के वातावरण के अतिरिक्तउनके अपने व्यवहार का बच्चे के व्यक्तित्व विकास पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा करता है।

प्रत्येक बच्चा अपने आपको परिवार के उस व्यक्ति के समान बनाने की कोशिश करता है जो उसके लिए आदर्शस्वरूप हो। सामान्यतया हर बच्चा या तो अपने पिता या फिर माँ के समान व्यवहार करने का प्रयत्न करता है। इस प्रक्रिया को तीन विभिन्न पक्षों से समझा जा सकता है

(1)प्रथमतया, बच्चा अपने और अपने आदर्श के बीच व्यवहारगत (भावनाओं और मनोवृत्तियों सहित) समानता की पहचान के रूप में देखता है।

(ii) द्वितीयतया, इस पहचान को बच्चे की उस मनोवृत्ति या इच्छा के रूप में देखा जा सकता है जो वह अपने आपको अपने आदर्श के रूप में देखना चाहता है।

(iii) अततया, इस पहचान को उस प्रक्रिया के रूप में देखा जा।सकता है जिसके जरिए बच्चा अपने आदर्श के गुण-चरित्र को अपनाता है।व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया को समझ पाने के लिए पहचान की उक्त पद्धति को मूल तत्त्व माना जा सकता है।

3. सामाजीकरण : समाजीकरण वह प्रक्रिया है जिसके जरिए शिशु को अपने जन्म के साथ ही व्यापक व्यवहारगत संभावनाओं की ऐसी सोगात मिला करती है जिनमें परिवार के साथ ही सामाजिक समूहों द्वारा पारस्परिक तौर पर स्वीकार्य योग्य व्यवहारों की रूपरेखा होती है। प्रारंभिक तौर पर इस समाजीकरण की शुरुआत शिशु के अपने मातृत्व संयोग से होती है जिसमें उसका बचपन पलता है। कालांतर में परिवार के अन्य सदस्यों और अन्य सामाजिक संयोगों से उसका बचपना और किशोरावस्था के दौर गुजरते हैं। इन सामाजिक समूहों में उसके स्कूली सहपाठीगण, पास-पड़ोस के दोस्त शामिल होते हैं जो आगे चलकर उसके सहकर्मी भी बन जाते हैं और उसका अपना एक समूह बन जाया करता है। कहा भी जाता है-“किसी व्यक्ति की पहचान इससे होती है कि उसके दोस्त-परिचित कौन और कैसे हैं।” ये सभी सामाजिक समूह मिलकर व्यक्तियों के व्यवहार-आचरण को गढ़ा-बुना करते हैं। इस संबंध
में अब तक अनेक साक्ष्य एकत्रित कर लिये गये हैं कि किस तरह यह समाजीकरण ही आज के संगठनों में कर्मचारियों के आचार-विचार आचरणस्वरूप को गठित करता है। इन्हें प्रत्येक समाज के सामाजिक मानदण्डों और नियम-कानूनों के रूप में देखा जा सकता है जिसमें कि हर व्यक्ति रहा करता है। व्यवहारगत धारणा का यह स्वरूप अधिकतर इन मानदण्डों और नियम-कानूनों के मर्यादापालन से ही उत्पन्न हुआ करता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि सामाजिक जीवन का व्यक्ति के
व्यवहार-गठन पर गहरा प्रभाव पड़ा करता है।

(c) स्थिति : विरासत और वातावरण के अतिरिक्त स्थिति।यह अन्य तत्त्व है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावित किया करती है। कोई निर्दिष्ट स्थिति किसी के व्यक्तित्व में समूचा उलटफेर नहीं कर सकती। फिर भी विभिन्न स्थितियों में किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के भिन्न- भिन्न पक्ष उभरकर सामने आ जाया करते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को किसी एक निर्दिष्ट स्थिति में समझ पाना जरा मुश्किल ही होता है।अनुसंधान पद्धतियों को इतना विकसित नहीं किया जा सका है।कि ऐसी स्थितियों को वर्गीकृत और उनका अध्ययन किया जा सके, किन्तु यह स्पष्ट जरूर है कि कुछेक स्थितियाँ ऐसी जरूर होती हैं जो अन्य स्थितियों की तुलना में व्यक्तिगत गठन पर विशेष प्रभाव छोड़ा करती हैं। उदाहरणस्वरूप, अपने उच्चाधिकारी से मिलते समय या फिर किसी धार्मिक स्थल पर प्रार्थनादि के समय कोई भी व्यक्ति अपने व्यवहार में आचरण-संतुलन बनाए रखेगा, किन्तु परिवार के सदस्यों या दोस्तों के साथ पिकनिक आदि के दौरान वह मुक्त व्यवहार करेगा और अपने आचरण पर लगाम लगाने की कोशिश नहीं करेगा।

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