व्यक्तिगत सिद्धांत

व्यक्तित्व के सिद्धान्त

जिस तरह व्यक्तित्व की अनेक परिभाषाएं हैं, ठीक उसी तरह व्यक्तित्व के अनेक सिद्धान्त भी हैं। अतएव सिद्धान्तकारों में व्यक्तित्व के सिद्धान्तों पर एक राय नहीं बन सकी। इन तमाम सिद्धान्तों में सर्वाधिक प्रमुख स्थान मिला है : किस्म, विशेषक, मनोविश्लेषक, सामाजिक ज्ञान और आत्म सिद्धान्त। इनमें से प्रत्येक पर संक्षिप्त चर्चा निम्नवत रूप से की जा रही है:

किस्म सिद्धान्त

अन्य विज्ञानों की तरह मानव प्रकृति के प्रथम विद्यार्थियों ने भी मानव व्यक्तित्व का अध्ययन करने के प्रयास में उसे कुछेक किस्मों में वर्गीकृत किया। व्यक्तित्व के इस वर्गीकरण को दो आधारों पर विभक्त किया गया: (i) शरीर, गठन और (ii) मनोवैज्ञानिक तत्त्व। शरीर गठन आधार के मामले किसी व्यक्ति के शारीरिक गठन/रूप-रेखा और व्यक्तित्व के मध्य संबंध जोड़े गए। तदनुरूप, ठिगने या सीधे शरीर गठन को मिलनसार और नरम प्रकृति का लंबे कद वाले दुबले शरीर गठन वाले व्यक्ति का आत्मसंयमी और एकान्तप्रिय एवं भारी-भरकम पेशी विन्यास वाले शरीर गठन को मुखर, कठोर और शारीरिक कार्यालापप्रिय के रूप में वर्गीकृत किया गया। यह तो मानना पड़ेगा कि किसी व्यक्ति के शरीर गठन/रूप-रेखा द्वारा उसके व्यक्तित्व को कुछ सीमा तक प्रभावित अवश्य किया जाता है फिर भी इन दोनों के बीच काफी सूक्ष्म संबंध होते हैं, न कि उतना जिस पर ऐसा वर्गीकरण जोर देता है। मनोवैज्ञानिक तत्त्वों पर आधारित व्यक्तित्व के किस्मों की बुनियाद अब अवधारणा पर टिकी होती है कि व्यक्ति की अंतक्रियात्मक उप- प्रणालियों की समग्रता ही उसका व्यक्तित्व हुआ करता है। तदनुसार व्यक्तियों को दो किस्मों में वर्गीकृत किया जाता है:

(i) अन्तर्मुखी, और

(ii) बहिर्मुखी।

अंतर्मुखी वे होते हैं जो मूलतया आत्मकेन्द्रित होते हैं, सामाजिक संपर्कों और अन्यों से अन्तक्रिया करने से बचते हैं, शांत और एकान्तप्रिय होते हैं। इनके विपरीत बहिर्मुखी लोग सामाजिक, दोस्ताना,मिलनसार, आक्रामक आदि हुआ करते हैं। इसमें संदेह नहीं कि व्यक्तित्वों को अंतर्मुखी और बहिर्मुखी किस्मों में वर्गीकृत काफी सरल और रोचक है, किन्तु इससे अधिक विस्तार और गहराई से समझने का प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। कारण यह है कि अधिकतर लोग बहिर्मुखी या अंतर्मुखी होने की अपेक्षा उभयमुखी हुआ करते हैं, अर्थात् वे इस अंतर्मुखी और बहिर्मुखी के दो चरम सिरों के बीच की कड़ी हुआ करते हैं।

विशेषिक सिद्धान्त

कुछ मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्ति के विशेषकों के आधार पर उसके व्यक्तित्व को समझने के प्रयास किये हैं। किसी व्यक्ति के विशेषक स्थायी प्रकृति के हुआ करते हैं, जिनके कारण उसे अन्यों से अलग प्रकृति का माना जाता है। लोकप्रिय मानव गुणों में शर्मीलापन, आक्रामकता,विनम्रता, आलसीपन, अभिलाषावादी, निष्ठावान और दब्बूपन आदि को शामिल किया जाता है। व्यवहार के रूप में ऐसे गुण जितने टिकाऊ होंगे
और विपरीत परिस्थितियों में भी इनकी बारम्बारता बनी रहेगी, ये उतने ही किसी व्यक्तित्व को परिभाषित करने में सहायक सिद्ध होंगे। इस तरह, इन विशेषकों को व्यक्तिगत परिवर्तकों अथवा आयामों के रूप में समझाया जा सकता है।

यह विशेषक सिद्धान्त निम्नलिखित तीन अवधारणाओं पर आधारित है:

1.ये विशेषक अनेक लोगों में समरूप लिए होते हैं और केवल उनकी मात्रा की पूर्णता परिवर्तित हुआ करती है।

2. ये विशेषक सापेक्षिक तौर पर स्थायी प्रकृति के होते हैं। उनका निरंतरता से बने रहने से ही मानव व्यवहार प्रभावित हुआ करते हैं।

3. किसी के व्यावहारिक सूचकांकों की मापजोख करके उसके विशेषक का अनुमान लगाया जा सकता है।

आलपोर्ट और केटल उन पूर्व मनोवैज्ञानिकों में से थे जिन्होंने इन।व्यक्तिगत विशेषकों को पृथक किया। आलपोर्ट ने अपने अध्ययन में लगभग 17,953 विशेषकों की पहचान की। स्पष्ट है कि इतने सारे विशेषकों के आधार पर मानव व्यवहार का पूर्वानुमान लगा पाना लगभग असंभव ही है। केटल ने सर्वप्रथम तौर पर इतनी बड़ी संख्या को घटाकर उन्हें संतुलनीय रूप देने का प्रयास किया। उसने पहले तो इन विशेषकों की संख्या घटाकर उनमें से 171 को पृथक किया और फिर उन्हें भी कम करके 16 विशेषकों को पृथक कर डाला जिन्हें उन्होंने स्रोत या प्राथमिक विशेषक कहा।

इस तरह व्यक्तित्व का विशेषक सिद्धान्त यह समझने का प्रयास करता है कि व्यक्तित्व परिवर्तकों के एक समूह द्वारा किस तरह किसी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित किया जाता है। फिर भी इस सिद्धान्त में यह अभाव खटकता है कि यह विश्लेषणात्मक होने की अपेक्षा अधिक वर्णनात्मक है। वस्तुतया ऐसा कोई प्रामाणिक साक्ष्य नहीं है जो इस विशेषक सिद्धान्त को व्यक्तित्व की परिशुद्ध मापजोख सिद्ध कर सके।

हाल के वर्षों में, जॉन ने ‘द 5 बिग मॉडल’ अर्थात् ‘पाँच बड़े प्रतिरूप’ के रूप में व्यक्तित्व-प्रतिरूप का प्रतिपादन किया है। अपने इस प्रतिरूप में उसने सभी अन्य परिवर्तकों को रेखांकित करते हुए निम्नवत पाँच आधारभूत व्यक्तित्व परिवर्तकों/आयामों को तार्किक बताया है:

1. बहिर्मुखता : वह जो सामाजिक बातूनी और हठधर्मी हो।

2. समझौतावादिता : वह जो अच्छी प्रकृति का सहयोगी और विश्वास योग्य हो।

3. कर्त्तव्यनिष्ठता : यह व्यक्ति जो जिम्मेवार, निर्भरयोग्य,आग्रही और उपलब्धित-अभिप्रेरित हों।

4. भावनात्मक स्थिरता : ऐसा व्यक्ति जो शांतचित्त, व्यग्र, उत्साही, अवसादग्रस्त और असुरक्षित हो।

5. अनुभव के प्रति खुलापन : ऐसा व्यक्ति जो कल्पनाशील, कलात्मक रूप से संवेदनशील और बुद्धिवादी हो।

मनोविश्लेषिक सिद्धान्त

व्यक्तित्व की एक और किस्म यह मनोविश्लेषिक सिद्धान्त भी है। इस मनोविश्लेषिक सिद्धान्त की मूल अवधारणा यह है कि मानव व्यवहार को उसके चेतन या अभिज्ञतापन और युक्तियुक्त सोचविचार की अपेक्षा अनदेखी ताकतें अधिक प्रभावित किया करती हैं। सिगमण्ड फ्रॉड ने अपने 40 वर्षों के लेखन और क्लिनिकल प्रेक्टिस पर आधारित इस मनोवैश्लेषिक सिद्धान्त को विकसित किया। फ्रॉड द्वारा अपने रोगियों पर किए गए क्लिनिकल प्रयोगों से इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सका कि व्यवहार को मुख्यतया अचेतन ढाँचे द्वारा प्रभावित किया जाता है। इस अचेतन ढाँचे में तीन तत्त्व होते हैं : इड (कामतत्व), इगो (अहम् ) और सुपर एगो (पराहम् )। स्वयं फ्रॉड ने यह स्वीकार किया कि यह विभाजन केवल अनुमान पर ही आधारित है और व्यक्तित्व के निश्चयात्मक स्वरूप नहीं हैं। यह तंत्रिका-विन्यास की असफलता है कि इन्हें केन्द्रीय स्नायुतंत्र में सही स्थान पर स्थापित नहीं किया जा सका।

इन तीन तत्त्वों, अर्थात् इड (कामतत्त्व), इगो (अहम् ) और सुपर इगो (पराहम् ) यहाँ निम्नवत् रूप से संक्षिप्त चर्चा की जा रही है।

(i) द इड (कामतत्त्व) : द इड अंतर्जात है और यह अतीन्द्रिय ऊर्जा का स्रोत है। यह जैविक अथवा प्रकृतिगत जरूरतों को तात्कालिक संतुष्टि चाहता है। यह अनगढ़ सा है और इसलिए आजीवन यह किसी भी व्यक्ति का मूल बना रहता है। द इड द्वारा संपूर्ण मानव जीवन के आधारभूत सिद्धान्त का पालन किया जाता है, अर्थात् कामवासन और आक्रामकता जैसे शारीरिक विषय द्वारा प्रस्तुत अतीन्द्रिय ऊर्जा (कामप्रवृत्ति) का तात्कालिक उन्मोचन-जो यदि न हो सके तो उसके व्यक्तित्व प्रणाली में तनाव की स्थिति निर्मित कर देता है। द इड द्वारा-तनाव में कमी नाकर- विलास सिद्धान्त का अनुपालन किया जाता है। चूंकि इड द्वारा किन्हीं कानूनों और नियमों का न तो ज्ञानवर्धन होता है और न ही उनका पालन किया जाता है तो, जैसा कि फ्रॉड ने स्वयं समझा, यह संबंधित व्यक्ति के साथ ही समाज के लिए भी खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

(ii) द इगो (अहम् ) : द इड को मानव व्यक्तित्व का अचेतन भाग माना गया है, जबकि एगो (अहम् ) उसका चेतन अंश हुआ करता है। अहम् का संबंध यथार्थ से होता है। यह अपने तर्क और बौद्धिकता से इड अर्थात् कामतत्त्व पर हावी होता है। कोई भी भूखा व्यक्ति कल्पनाओं को खाकर अपनी भूख को शांत नहीं कर सकता बल्कि इसके लिए उसे वस्तुगत रूप में खानपान की आवश्यकता होती है। इस तरह अहम् को भूमिका वाकई खानपान करने के इस यथार्थ में होती है जिससे कि भूख की तुष्टि की जाए या उसके तनाव की स्थिति को शांत किया जाए।

(iii) सुपर इगो (पराहम्): सुपर इगो अर्थात् पराहम उन मूल्यों, मापदण्डों और नीतिपरकता का समूह है जो व्यक्ति को समाज में समचित रूप से व्यवहार-आचरण के लिए मार्गनिर्देशन किया करता है और उसे शासित भी करता है। एक अर्थ में पराहम को विवेक के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। किसी स्थिति/समाज में इसके द्वारा अहम् को वे मानदण्ड और मूल्य प्रदान किए जाते हैं जिनकी सहायता से यह निर्णय किया जा सके कि सही क्या है और गलत कौनसा है। अन्य शब्दों में पराहम द्वारा समाज के स्थापित मानदण्डों और मानकों के अनुरूप किसी कार्यालाप/व्यवहार के सही या गलत होने का निर्धारण किया जाता है।

समग्र रूप से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इड अर्थात् कामतत्त्व द्वारा भोगविलास चाहा जाता है, इगो अर्थात् अहम् द्वारा यथार्थ का सत्यापन किया जाता है और सुपर इगो अर्थात् पराहम् द्वारा पूर्णता के लिए प्रयास किया जाता है।

जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है-फ्राड का मनोवैश्लेषिक सिद्धान्त एक सैद्धान्तिक संकल्पना पर आधारित एक कल्पनानुमान है। फिर भी अपने वैज्ञानिकतापूर्ण सत्यापन और विधिसम्मत होने के संबंध में यह कोई उपाय नहीं सुझाता। इसी कारणवश मानव व्यवहार का पूर्वानुमान लगाने के लिए इसे काफी प्रासंगिक और समुचित नहीं माना जा सकता। इन सबके बावजूद भी यह अचेतन अभिप्रेरणा का विचार उपलब्ध कराता है जिसकी सहायता से मानव व्यवहार की बेहतर समझ बना करती है।

सामाजिक ज्ञान सिद्धान्त
वस्तुतया देखा जाए तो मानव व्यवहार सामान्य तौर पर या तो सीखा जाता है अथवा ज्ञानबोध के माध्यम से उसे रूपान्तरित किया जाता है। ज्ञानबोध को साधारण तौर पर किसी के व्यवहार में उस परिवर्तन से परिभाषित किया जा सकता है जो किसी अनुभव के फलस्वरूप से आया करता है। अन्य शब्दों में ज्ञानबोध की उत्पत्ति तब हुआ करती है जब किसी अनुभव के फलस्वरूप व्यक्ति अपने पूर्व व्यवहार के तौर तरीकों से अलग हटकर कुछ भिन्न किया करता है।

सीखने या ज्ञानबोध की उत्पत्ति दो तरीकों से हुआ करती है :


(i)सुदृढीकरण, और
(ii) अन्यों का अवलोकन करके।

अन्यों का अवलोकन करके सीखने की क्रिया को ‘प्रतिनिधिमूलक सीख’ भी कहा जाता है। सामाजिक ज्ञान सिद्धान्त का जोर इस तथ्य पर है कि व्यक्ति किसी निर्दिष्ट स्थिति में कैसा व्यवहार या कार्यालाप किया करता है। इस सिद्धान्त का यह दृष्टिकोण है कि किसी स्थिति के विशिष्टतापूर्ण हालात यह निर्धारित करते हैं कि उन स्थितियों में किसी व्यक्ति का व्यवहार कैसा होगा। इससे पूर्व ऐसी ही स्थितियों में उसके द्वारा स्थिति की समझ और उसके द्वारा किए गए व्यवहार से भी इस स्थिति में निश्चित रूप से उसका व्यवहार प्रभावित होगा। यह माना जाता है कि स्थितिवश ही किसी व्यक्ति के व्यवहार की रूपरेखा बना करती है। इसके साथ ही यह भी यथार्थ ही है कि किसी व्यक्ति के व्यवहारवश परिस्थितिगत हालात भी प्रभावित हुआ करते हैं। जो वस्तुतया घट रहा हो उस पर व्यक्ति के चयनात्मक व्यवहार उन कुछेक घटनाक्रमों की रोकथाम संभव हो सकती है, जो उसपर अतिक्रमण कर रहे हों। अतएव घटनाक्रम और व्यक्ति के संबंध में पारस्परिकता अर्थात “ले और दे” की रूपरेखा भी हुआ करती है।

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