संचार का अर्थ


कम्युनिकेशन का अर्थ

‘कम्युनिकेशन’ शब्द लेटिन भाषा के शब्द ‘कम्युनिज’ से बना है जिसका अर्थ है ‘कॉमन’। इसलिए यह कहा जा सकता है कि कम्युनिकेशन की मदद से आपसी समझ का एक सामान्य आधार अर्थात् सामान्य वातावरण निर्मित हो जाता है। संक्षेप में, कम्युनिकेशन का अर्थ है, विचारों तथा सूचनाओं का आदान-प्रदान जिसमें आपसी समझ बढ़ सके।

कम्युनिकेशन मानव व्यवहार का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। इसलिए मानव के सम्प्रेषण में वे सभी कारक प्रभाव डालते हैं जो मानव व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

एक संगठन, एक निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एकजुट हुए व्यक्तियों का समूह है। उद्देश्यों की प्राप्ति इनके प्रयासों के उचित समन्वयन पर निर्भर करती है। मानवीय गतिविधियों का समन्वयन तभी सम्भव है, जब संचार की एक प्रभावशाली प्रणाली हो। यह सूचना के विनिमय तथा विचारों के संचार में मददगार होता है, संचार प्रणाली जितनी कुशल होगी कार्यकर्ताओं तथा प्रबन्धन के मध्य सम्बन्ध भी उतने ही सुखद होंगे। प्रभावशाली संचार प्रणाली के अभाव के कारण संगठन में कई तरह के संदेह तथा विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। यही कारण है कि अधिकांश संस्थाएं अपने यहाँ एक प्रभावी कम्युनिकेशन प्रणाली स्थापित करने हेतु विशेष प्रयास करती है।

परिभाषाएं

संचार की कई परिभाषाएं हैं, इनमें से कुछ अन हैं:

1. ”कम्युनिकेशन दो या ज्यादा व्यक्तियों के द्वारा तथ्यों, विचारों, मतों अथवा भावनाओं का परस्पर आदान-प्रदान है।” -जॉर्ज टैरी

2. ”कम्युनिकेशन सूचना का एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक स्थानान्तरण है चाहे इसमें विश्वास व्यक्त हो या न हो।” -कूट्ज एवं ओ’डोनेल

3. ”कम्युनिकेशन उन सभी गतिविधियों का योग है जो एक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के मस्तिष्क में समझ उत्पन्न करने हेतु करता है इसमें कहने, सुनने तथा समझने की लगातार प्रक्रिया शामिल है।” -एलन लुइस

4. ”कम्युनिकेशन सूचना और समझ के एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक स्थानांतरित होने की प्रक्रिया है, यह सार रूप में व्यक्तियों के मध्य समझ का एक सेतु है। आपसी समझ के इस सेतु के उपयोग से हम संदेह की नदी सुरक्षित रूप से पार कर सकते -कीथ डेविस

5. “संप्रेषण, भाषण, लेखन अथवा संकेत के जरिये होने वाला विचारों, सलाह अथवा जानकारी के मध्य आपसी हेर-फेर है।” -रॉबर्ट एन्डरसन

उपरोक्त परिभाषा से यह बहुत स्पष्ट है कि संप्रेषण, ट्रांसमीटिंग ‘इन्फॉर्मेशन’ में शामिल है। डब्ल्यू एच. न्यूमेन तथा सी.एफ समर जूनियर द्वारा परिभाषित संप्रेषण न सिर्फ वास्तविक तथ्यों तथा निर्धारण करने योग्य विचारों तथा सलाहों के बारे में बल्कि भावनाओं के बारे में भी इन्फॉर्मेशन ट्रांसमिट करते हैं। एक प्रेषक, इन्फॉर्मेशन ट्रांसमिटिंग के दौरान जानबूझकर या अज्ञानतावश, अपने एटीट्यूड या मस्तिष्क के फेम को संप्रेषित कर सकता है। यह अक्सर देखा गया है कि लोग, ताना मारने की लाय में बड़े-बड़े प्रशंसा भरे शब्द कहते हैं, यहाँ पर शब्दों का कोई महत्त्व नहीं होता, पर लय का वास्तविक अर्थ होता है। चेहरे की अभिव्यक्ति, संप्रेषण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, अगर व्यक्ति उच्च स्तर में वीरता की अभिव्यक्ति का प्रयोग करता है, तो वह अपनी कायरता तथा डरपोकपन को छिपाने के लिए इसको नकाब के रूप में प्रयोग कर सकता है जो कि विश्वासघात हो सकता है।

एक व्यवसाय तभी सम्पन्न हो सकता है जब संगठन के सभी उद्देश्य प्रभावीपूर्ण प्राप्त हों। एक संगठन की कुशलता लिए, सभी लोगों को (संगठन के अंदर तथा बाहर के भी) अपने संदेश व्यवस्थित ढंग से भेजना आना चाहिये। बिजनेस गोल (लक्ष्य) की प्राप्ति हेतु संगठन के अंदर एवं बाहर भी विचारों तथा ज्ञान के आदान-प्रदान को बिजनेस कम्युनिकेशन कहा जाता है।

इसलिए बिजनेस कम्युनिकेशन, कर्मचारियों के कार्य को सुधारने के लिए, कम्पनी के अंदर, टीम के कार्यों में सुधार के लिए एवं समस्त संगठन के कार्य में सुधार करने का एक टूल है जो कि सभी एक समान उद्देश्य के साथ संगठन की नीति को लागू करना है ताकि उसके विजन तक पहुंचकर उसके मिशन को पूर्ण कर सकें।

कम्युनिकेशन (संचार) की विशेषताएं/गुण

अगर हम कम्युनिकेशन की परिभाषाओं का विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि कम्युनिकेशन प्रक्रिया में निम्न विशेषताएं होनी चाहिए जो कम्युनिकेशन की प्रवृत्ति बतलाती हैं।

1. संचार के बगैर नहीं रहा जा सकता-संचार हमेशा विद्यमान रहता है एवं इसके बगैर हम नहीं रह सकते। चेहरे के भावों की बात न करते हुए, प्रत्यक्ष भावभाव तथा बातचीत के अन्य तरीके, यद्यपि एक व्यक्ति का चुप रहना भी उसकी विचारधारा को प्रकट करता है।

2. लगातार क्रम-संचार एक समय पर एक कला या घटना नहीं है वरना यह एक लगातार क्रम है जिसमें विभिन्न घटनाओं एवं क्रियाओं को शामिल किया जाता है जो कि आपस में सम्बन्ध रखती है एवं एक दूसरे पर निर्भर है।

3. दोहरा आदान-प्रदान- “प्राप्त करने वाले के जवाब को ध्यान में न रखते हुए सिर्फ बोलना या लिखना आपसी मतभेद उत्पन्न करता है।”-जी.आर, टैरी संचार तब तक पूरा नहीं कहा जा सकता जब तक प्राप्त करने वाला समझ नहीं जाता। यह सुनिश्चित बनाने के लिए कि प्राप्त करने वाले ने सूचना समझ ली है उसके लिए वापस संदेश जाना जरूरी है। इसलिए संदेशवाहन दोहरा आदान-प्रदान है न कि एक तरफा।

4. मर्यादा की भूमिका-इन्सान की पाँच ज्ञान इन्द्रियाँ (देखना,सुनना, छूकर, स्वाद लेकर तथा महसूस करने के उद्देश्यों या चिन्हों का अर्थ निकालने के लिए संचार विधि बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। हमारी इन्द्रियों के उपदेशक सीमित हैं तथा अद्भुत पदार्थ का केवल छोटा-सा हिस्सा ही ढूँढ़ पाती हैं। अत: हम इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि हमारा संदेशवाहन चुनिंदा है।

5. सर्वमान्य-संदेशवाहन सर्वमान्य अद्भुत पदार्थ है। सभी प्राणी (इन्सान, पक्षी, पशु इत्यादि) अपने चिन्हों तथा निशानों द्वारा सन्देश व्यक्त करते हैं।

6. सामाजिक विधि-संचार एक सामाजिक विधि है क्योंकि यह समाज को इस योग्य बनाता है जिससे वह लिखित, बोलकर या मौखिक सन्देश के आदान-प्रदान द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को सन्तुष्ट कर सके। यह संचार ही है जिसके द्वारा दो या अधिक व्यक्ति आपस में क्रिया करके एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं तथा समझ के अन्तर के समाप्त कर सकते हैं।

7. आदान-प्रदान की क्रिया-क्योंकि संचार क्रम में आपसी मेल-जोल तथा आदान-प्रदान निहित होता है, यह आदान-प्रदान की क्रिया है यह देखा गया है कि पाँच अथवा छः व्यक्तियों के समूह से जब एक व्यक्ति प्रस्थान कर जाता है जो वार्तालाप पूरी तरह से परिवर्तित होता है लोगों में पूर्ण परिवर्तन आ जाता है, जब वे एक संचार स्थिति से दूसरी में चले जाते हैं। कभी-कभी बातूनी व्यक्ति भी चुप हो जाता है।

8. बहु-आयामी-संचार बहु-आयामी है। इसके स्रोत, स्रोता तथ संदेश के प्रभाव बहु-आयामी हैं।

9. बहु उद्देशीय-संचार क्रम बहु उद्देशीय है। भागीदार जहाँ तक जिनके उद्देश्य होते हैं, जिन्हें वे पूरा करना चाहते हैं, वह स्रोतों के रूप में काम करते हैं। भागीदार उस सीमा तक जहाँ वे उद्देश्य पूरा करना चाहते हैं, प्राप्त कर्ता के रूप में काम करते हैं।

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