संचार की प्रकृति

संचार की प्रकृति
(विज्ञान या कला)

यह प्रश्न कि ‘क्या संचार एक विज्ञान या कला है’, यद्यपि
इतना महत्त्वपूर्ण नहीं फिर भी यह प्रभावी संचार से सम्बन्ध रखता है। विज्ञान मूलभूत सिद्धान्तों की खोज करता है जबकि कला वास्तविकता उत्पन्न करती है। कुछ लोग मानते हैं कि कला की विशिष्टता एक आन्तरिक उत्पन्न किस्म है। दूसरी तरफ यह मानना पड़ेगा कि संचार की विशिष्टता का ज्ञान लगातार अभ्यास एवं कठिन परिश्रम द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, जो कि प्रभावी सन्देशवाहन के सिद्धान्तों पर आधारित है।

कला-विशेष क्रियाओं को करने का तरीका अथवा किस तरह से उद्देश्य को पूरा करना है कला कहलाता है। विज्ञान द्वारा विधिवत विश्लेषण किया जाता है जबकि. कला विज्ञान को लागू करती है। उत्पादकता कला का सार है।

विज्ञान एक संगठित ज्ञान का समूह है जिसके सिद्धान्त संसार में सर्वमान्य हैं तथा विचारधारा ये एक सुनिश्चित ढंग से प्रवेक्षण द्वारा नियन्त्रित होती है। जो कुछ हम महसूस करते हैं यह उसके कारण एवं प्रभाव में सम्बन्ध स्थापित करता है तथा सूचनार्थ के लिए विवरण विभिन्न अवस्थाओं में प्रकट करता है। पहले से स्थापित सिद्धान्तों, नमूनों की सत्यता के नतीजों का परीक्षण करता है। अगर परीक्षण सही उतरता है तो विचारधारा और पक्की हो जाती है। इसके विपरीत अगर परीक्षण सही नहीं उतरता तो सिद्धान्तों अथवा विचारधाराओं में नये परिवर्तन किए जाते हैं।

कला उद्देशीय या विषय-वस्तु हो सकती है, उद्देशीय तथा
विषय-वस्तु कला में अन्तर के सम्बन्ध में, पी.डी. ओसपैन्सकी ने अपनी पुस्तक अद्भुत की खोज में लिखा है “क्या उद्देशीय कला में कलाकार वास्तव में ‘उत्पन्न’ करता है, तथा विषय-वस्तु कला में प्रत्येक वस्तु सम्भावित है। कलाकार स्वयं उत्पन्न नहीं करता वरन् अपने आप उत्पन्न हो जाती है।” इसका अर्थ यह है कि वह विचारों, धारणाओं एवं ख्यालों की शक्ति रखता है तथा जो कुछ भी हो उसका उन पर नियन्त्रण नहीं होता ….. कुछ भी भिन्न नहीं होता एवं यहाँ कुछ भी निश्चित नहीं होता। विषय-वस्तु कला में कुछ भी अनिश्चित नहीं होता।” उद्देशीय कला उच्च कोटि की होती है जो कि कलाकार की चेतन अवस्था से उत्पन्न होती है जबकि विषय-वस्तु कला अचेतन अवस्था में पैदा होती है।

संचार विज्ञान तथा कला दोनों है। यह विज्ञान इसलिए है क्योंकि यह सर्वमान्य सिद्धान्तों पर आधारित है जिससे मैनेजर को विभिन्न व्यक्तियों के दिमागों की सूचना उन्नतिशील तकनीक द्वारा जोड़ने में मदद मिलती है। संचार विधिवत् ज्ञान की प्रक्रिया, सिद्धान्तों एवं विचारधाराओं की अग्रसर प्रणाली पर आधारित है। पर इसने अपने-आपको गणित विज्ञान की तरह विकसित नहीं किया है, जिससे उच्च स्तरीय सही नतीजे जाने जा सकें। यह सामाजिक विज्ञान ज्यादा है क्योंकि लोगों की विचारधाराओं पर निर्णय के लिए निर्भर करती है। पर इसके पूर्ण रूप से ठीक न होने पर भी उच्च स्तर के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रभावी संचार के लिए उचित प्रशिक्षण लेना पड़ता है।

संचार कला ज्यादा है क्योंकि यह व्यक्तिगत सोच तथा विशेष हालत में उसकी विशिष्टता पर निर्भर करती है। नई अवस्थाएं एवं नई विधियाँ किसी समस्या को सुलझाने के लिए हमेशा नये तरीकों की माँग करती है। प्रभावी संचार हेतु यह जरूरी है कि संचार उद्देशीय हो। प्रत्येक व्यक्ति का सन्देश भेजने का अपना तरीका है पर वह अपनी अन्तर- आत्मा से वान्छित उद्देश्य के लिए सन्देश प्रभावी ढंग से भेजता है।

संचार के कार्य

समस्त समाज हेतु संचार ऑक्सीजन तथा पानी की जरूरत के समान कार्य करता है। यह संचार द्वारा ही सम्भव है कि हम अपनी आपसी समझ के अन्तर को दूर करके अच्छे सम्बन्ध स्थापित कर सकते हैं। एक व्यक्ति के लिए संचार विशिष्टता उसके व्यापार तथा पेशे में सफलता प्राप्ति के लिए बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। व्यक्ति चाहे कितना ही पेशेवर विशिष्ट ज्ञान क्यों न रखता हो उसे अपने उत्थान तथा तीव्र बुद्धि के लिए संचार के द्वारा सफलता अवश्यमेव है। एक व्यक्ति को यह जानना जरूरी है कि किस तरह से सन्देश प्रभावी ढंग से भेजा जाए। संचार न सिर्फ व्यापारिक पेशे की सफलता हेतु आवश्यक है वरन् संस्थान को अच्छे ढंग से चलाने के लिए भी जरूरी है और अधिक उदाहरणार्थ, संचार के कार्यों तथा महत्त्व को निम्न दशाओं से जाना जा सकता है-

(क) संचार के साधारण कार्य एवं महत्त्व संचार के व्यक्तिगत कार्य एवं महत्त्व

(ग) संचार के व्यापारिक कार्य एवं महत्व

(क) संचार के साधारण कार्य

1. उचित वातावरण-यह संचार द्वारा ही सम्भव है कि विभिन्न व्यक्ति अपने विचारों तथा उद्गारों का आदान-प्रदान करके एक-दूसरे को समझ सकते हैं। जब दो या ज्यादा व्यक्ति एक-दूसरे को पूर्ण रूप से समझ लेते हैं तो उनमें आपसी समझ का एक उचित वातावरण पैदा हो जाता है तथा इससे आपसी मतभेद हल हो जाते हैं।

2. तकनीकी उन्नति-नये-नये आविष्कारों को दूसरों तक पहुँचाने हेतु संचार जरूरी है। अगर संचार उन्नतिशील न हो तो तकनीकी उन्नति धीमी पड़ जायेगी। अगर हम विभिन्न देशों के संचार के दायरे एवं तकनीकी उन्नति की तुलना करें तो हम पायेंगे कि इनमें आपसी घनिष्ट सम्बन्ध है।

3. आर्थिक उन्नति-आर्थिक उन्नति में संचार बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। विशेष तौर पर इसका महत्त्व इस क्षेत्र में और बढ़ जाता है जबकि औद्योगिक आर्थिकता समान जोड़ वाली आर्थिकता की तरफ अग्रसर हो रही हो जिसमें सूचना, सेवा उत्पाद तथा धन का आदान-प्रदान विद्युत द्वारा होता हो।

4. सांसारिक गाँव-खुलेपन एवं भूमण्डलीकरण की प्रभावी धारा ने संसार को एक छोटे से गाँव में परिवर्तित कर दिया है। आधुनिक तकनीकीकरण ने एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई है तथा भविष्य में भी आशा की जा सकती है कि विभिन्न देशों की भौगोलिक और सामाजिक सीमाओं को तोड़ एवं लाँघ कर विभिन्न लोगों के समुदायों तथा उनके रीति-रिवाजों को
इकट्ठा कर दिया जायेगा।

(ख) संचार के व्यक्तिगत कार्य
1. अपने-आप को प्रकट करना-यह संचार द्वारा ही सम्भव है कि एक व्यक्ति अपनी राय, विचार, अनुभूति इत्यादि को प्रकट कर सकता है। यह एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति द्वारा समझने में मदद प्रदान करता है।

2. मानव आवश्यकताओं को सन्तुष्टि- संचार मनुष्य को
आवश्यकताओं, अपना-पन तथा पहचान इत्यादि की सुरक्षा प्रदान करता है। यह संचार ही है जिसके द्वारा मनुष्य अपने आन्तरिक उद्गारों को प्रकट करके आरामदेह महसूस करता है। अगर संचार न हो तो मनुष्य विपरीत विचारधारा वाला, निष्क्रिय, स्थिर एवं कभी-कभी मानसिक रोगी बन जाएगा।

3. मानवी सम्बन्ध बनाना-यह सन्देश वाहन ही है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी विचारधारा को प्रकट करके दूसरों को समझता है। आपसी समझ में अन्तर कम होने से सम्बन्ध और मजबूत होते हैं। दो-तरफा सन्देशवाहन से खुलापन, विश्वास, सहायता तथा एकरूपता विभिन्न व्यक्तियों के मध्य उत्पन्न हो जाती है।

4. जीवन वृत्ति में उन्नति-मनुष्य की प्रभावी संचार की योग्यता उसे कार्य प्रभावी ढंग से करने में मदद करती है। संचार विशिष्टता- लिखने, बोलने तथा सुनने इत्यादि में, एक व्यक्ति के पेशे में उन्नति की भूमिका बनाती है।

(ग) संचार के व्यापारिक कार्य संचार उतना ही व्यापार हेतु आवश्यक है जितना शरीर के लिए खून। इसका महत्त्व व्यापार की क्रियाओं के पेचीदापन तथा मुश्किलों के बढ़ते एवं प्रतिस्पर्धा के कारण और भी बढ़ जाता है। बगैर प्रभावी संचार के संगठन अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर सकता, प्रबन्धक अपना कार्य ठीक ढंग से नहीं कर पाते तथा समस्त संसार स्थायी हो जाता है।

संचार निम्नलिखित बातों से यह प्रकट करता है कि इसका कितना महत्व है-

1. व्यापार कार्य-कुशलता से होना-संचार संस्थान की सफलता तथा कुशलतापूर्वक कार्य करने के लिए आवश्यक है। संचार के द्वारा ही एक साफ तथा उचित वातावरण पैदा होता है, संस्थान के उद्देश्य तथा नीतियों को कर्मचारियों तक पहुंचाया जाता है एवं कार्य सम्पन्न करने के लिए विभिन्न स्रोतों का समन्वय उत्पन्न किया जा सकता है। अगर संचार प्रभावी न होता तो आपसी सूझबूझ का वातावरण पैदा न होता जो कि संस्थान के कार्यों के लिए बहुत ही जरूरी है।

2. संचार का न होना महंगा पड़ता है-अगर संचार की व्यवस्था न हो तो संस्थान के लिए यह महँगा साबित हो सकता है। सीधे तौर पर उत्पादन रुक जायेगा तथा कर्मचारी बेकार बैठे रहेंगे एवं अप्रत्यक्ष रूप में कर्मचारियों में आपसी मतभेद तथा उनकी काम करने की रुचि कम हो जायेगी जिससे उत्पादकता तथा उत्पादन प्रभावित होगा। चाहे उद्योग छोटा हो अथवा बड़ा, चाहे उन्नतिशील हो या प्रतियोगिता से पीड़ित हो। कोई भी संस्थान संचार के बगैर जीवित नहीं रह सकता।

3. प्रबन्धकीय कार्यों का आधार-संचार प्रत्येक प्रबन्धक के कार्य से होकर गुजरता है। इस सम्बन्ध में जार्ज आर. टैरी ने कहा है- “यह प्रबन्धकीय विधियों की क्रियाओं को सुचारू रूप से करने हेतु चिकनाहट वाले मसाले का कार्य करता है।” सन्देशवाहन प्रबन्धकों द्वारा अपने कार्यों को करने के लिए निम्न रूप में मदद करता है।

(क) पहले से सोचना-प्रबन्धकों का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि इस बात को पहले से ही सोचना कि उनके उत्पादन का सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक वातावरण में विभिन्न देशों एवं क्षेत्रों में क्या भविष्य है। उनको सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक जगत से इस हेतु सम्बन्ध बनाये रखना होगा कि उनके उत्पादन का भविष्य क्या होगा एवं कम्पनी पर इसका क्या प्रभाव होगा।

(ख) नवीन परिवर्तन-आधुनिक युग के तकनीकीकरण तथा तेजी से बढ़ते नवीन परिवर्तन को ध्यान में रखकर संस्थान द्वारा परिवर्तन लाना जरूरी है। इसके लिए संस्थान को आधुनिक शिक्षा प्रदान करने वाले विश्वविद्यालयों एवं अन्य उन्नतिशील तकनीकी संस्थानों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए सम्पर्क बनाए रख कर अपने कर्मचारियों को बतलाना होगा। ऐसा करने के लिए संचार अति आवश्यक है।

(ग) योजना बनाने-कर्मचारियों तथा विभिन्न प्रबन्धकों द्वारा संचार के आधार पर विभिन्न योजनायें, नीतियाँ, प्रोग्राम एवं विधियों तैयार करना जरूरी है। इसके बाद इन सबको क्रियान्वित करवाने के लिए संचार की जरूरत होती है।

(घ) संगठित करना-संगठित करने का सम्बन्ध व्यापार की आवश्यक क्रियाओं का निर्णय लेना इनको विभिन्न विभागों में बाँटना तथा क्रियान्वित करवाने के लिए अधिकार सौंपने से है। संगठन को प्रत्येक क्रिया के लिए संचार की जरूरत होती है।

उदाहरण के तौर पर विभिन्न स्रोतों की उपलब्धता को जानकारी प्राप्त करना, विभिन्न अधिकारियों के अधिकार निर्धारित करने हेतु प्रत्येक तरफ से सूचना की जरूरत होती है।

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