समूहों के प्रकार


समूहों के प्रकार

संगठनों में लोगों के सामाजिक व्यवहार के आधार पर मनोवैज्ञानिकों एवं समाजशास्त्रियों ने समूहों के अनेक विभिन्न प्रकारों की पहचान की है। इनमें से प्रत्येक के उदाहरण को अधिकांश बड़े संगठनों में पाया जा सकता है। फिर भी आधारगत समूहों के चार प्रकार होते हैं जो सभी संगठनों में विद्यमान होते हैं।


(i) औपचारिक समूह,
(ii) अनौपचारिक समूह,
(iii) खुले और बंद समूह,
(iv) प्राथमिक और द्वितीयक समूह।

1. औपचारिक समूह : औपचारिक समूहों से हमारा तात्पर्य उन समूहों से है, जो निर्दिष्ट कार्यगत जिम्मेदारियों और सुस्थापित कार्यों के साथ संगठन की संरचना के अनुरूप होते हैं। इन औपचारिक समूहों में प्रत्येक को जो व्यवहार करना होता है उसे संगठनात्मक लक्ष्यों द्वारा विहित और दिशानिर्देशित किया जाता है। औपचारिक समूहों के स्वरूप निम्नवत हुआ करते हैं:

1. औपचारिक समूह अपनी संगठनात्मक संरचना के अंश हुआ करते हैं।

2. प्रबंधन द्वारा इन्हें समझबूझकर संज्ञानतावश, सौंपी जिम्मेदारियों का निर्वाह करने के लिए गठित किया जाता है।

3.संदेश-संप्रेषण की रूपरेखा सुपरिभाषित होती है और समूह के सदस्यों के व्यवहार को विनियमित करने के लिए नियम बनाए
जाते हैं।

4.समूह या तो उच्च प्रबंधन टीम के रूप में स्थायी प्रकृति के होते हैं जैसे कि निदेशक मण्डल जो कि संगठन को विशिष्टतागत सेवाएं आदि प्रदान करते हैं, या फिर इन औपचारिक समूहों का अस्थायी तौर पर गठन किया जाता है ताकि कुछेक विनिर्दिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति की जा सके। जब ऐसे उद्देश्यों की पूर्ति हो जाती
है तो इनका कार्यकाल समाप्त हो जाया करता है। इन्हें अस्थायी समितियों, कार्यदलों आदि के रूप में गठित किया जाता है।

इन औपचारिक समूहों को और भी निम्नवत् उपसमूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

(i) कमाण्ड समूह : इस कमाण्ड समूह को औपचारिक समूह का सबसे आम प्रकार माना जाता है। यह सापेक्षिक तौर पर स्थायी प्रकृति का होता है और संगठन तालिका में इसे विनिर्दिष्ट किया जाता है। मैनेजरों, सुपरवाइजनों और अधीनस्थों को लेकर इसकी रचना की जाती है जो नियमित तौर पर मिल बैठकर उत्पाद या सेवा को उन्नत बनाने के लिए सामान्य और विशिष्ट विचारों और उपायों पर चर्चा किया करता है। व्यावसायिक संगठनों में अधिकांश कर्मचारी ऐसे कमाण्ड समूहों में कार्य किया करते हैं। किसी संगठनात्मक चार्ट में इस कमाण्ड समूह की स्थिति को निम्नवत रूप से दर्शाया जा सकता है:

इस तरह एक मैनेजर और उसे रिपोर्ट करने वाले सुपरवाइजरों से मिलकर एक कमाण्ड समूह बनता है। सुपरवाइजर और उसे रिपोर्ट करने वाले अधीनस्थों को लेकर अन्य कमाण्ड समूह बना करते हैं।

(ii) टास्क फोर्सेस (कार्य समूह) : इन टास्क फोर्सेस अर्थात् कार्य समूहों का भी संगठनात्मक स्वरूप हुआ करता है। किन्तु ये अस्थायी प्रकृति के होते हैं जिसमें कर्मचारीगण मिलकर किसी निर्दिष्ट कार्य या परियोजना पर कार्य किया करते हैं तथापि ऐसे कार्य समूह का कार्य अपने तात्कालिक सुपरवाइजर तक ही सीमित नहीं हुआ करता।

उदाहरणस्वरूप, यदि अनेक विभागों को मिलाकर कोई समस्या उत्पन्न होतो ऐसे कार्य समूह में प्रभावित विभागों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाता है जो मिलजुलकर समस्या की जाँचपरख के पश्चात् उसका समाधान सुझाया करते हैं।

(iii) समितियाँ : समितियों का गठन भी कुछ विशेष परियोजनाओं के लिए किया जाता है। ये स्थायी प्रकृति की हो सकती है जैसे कि आयोजना समिति, या बजट समिति और ये संगठनात्मक संरचना का निहित अंश हुआ करती है। कोई समिति अस्थायी प्रकृति की भी हो सकती है जैसे कि कार्यसमूह हुआ करते हैं। ऐसी प्रकृति की समिति कागठन किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए किया करते हैं जो अपने उद्देश्य की पूर्ति तक ही कार्य किया करती हैं।

2. अनौपचारिक समूह : अनौपचारिक समूह ऐसा बंधन है जिसकी न तो औपचारिक संरचना होती है और न ही उसका संगठनात्मक निश्चय ही होता है। कार्य वातावरण में ये समूह अनायास ही अस्तित्व में आ जाया करते हैं जो कि संगठन में कार्यरत लोगों की आत्मरक्षा, कार्य सहायता और सामाजिक क्रिया-प्रतिक्रियाओं से प्रेरित हुआ करते हैं। इन समूहों के स्वरूप निम्नवत हुआ करते हैं:

●प्रबंधन की बजाय संगठन के सदस्यों द्वारा ही ऐसे अनौपचारिक समूह बना लिए जाते हैं।

●लोगों के बीच सामाजिक क्रिया-प्रतिक्रिया से ये समूह अनायास ही बन जाया करते हैं।

●ये सामान्य हितों, भाषा, रुचि, जाति, धर्म, पृष्ठभूमि आदि पर आधारित हुआ करते हैं।

●ये समूह औपचारिक प्राधिकार के दायरे से बाहर होते हैं और इनके कोई नियमादि नहीं हुआ करते।

●यद्यपि इन्हें कोई शासकीय-प्रशासकीय मान्यता नहीं होती फिर भी ये व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों के नेटवर्क के रूप में इनकी औपचारिक संरचना बनी रहती है।

●इन समूहों की अपनी संरचना, अपने नेता और समर्थक समूह- लक्ष्य और कार्यरत स्वरूप हुआ करते हैं। इनके नियमादि का लिखित स्वरूप नहीं होता और इनकी अलिखित आचरण संहिता का सभी सदस्यों द्वारा पालन किया जाता है। इसके सदस्य परस्पर आस्था-विश्वास और सम्मान की भावना बनाए रखते हैं।
होती हैं जिनमें इस स्थिति से उस स्थिति में परिस्थितिवश।

● औपचारिक समूहों की अपेक्षा इन अनौपचारिक समूहों के अधिक लचीलापन होता है। इसके नियम और कार्यविधियाँ अलिखित बदलाव होते ही रहते हैं।

● चूकि इन समूहों में सदस्य परस्पर व्यक्तिगत संपर्क पर अपना ध्यान केन्द्रित रखते हैं, इसलिए इनमें उद्यम का माननीय पक्ष प्रबल हुआ करता है जबकि औपचारिक समूहों के तकनीकी पक्ष
हावी रहा करता है।

अनौपचारिक क्रिया-प्रतिक्रिया चूँकि अनायास ही हुआ करती हैं इसलिए वह कभी भी और किसी भी स्थान पर संपादित की जा सकती है। फलस्वरूप ये अनौपचारिक समूह विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं जैसा कि आगे बताया जा रहा है:

(i) हितवर्षक और मैत्रीपूर्ण समूह : जो लोग सामान्य कमाण्ड या कार्यसमूहों से संबद्ध हों या न हों वे किसी ऐसे विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए आपस में संबद्ध हो सकते हैं, जिसमें उनमें से प्रत्येक का हित निहित हो। इसे हितवर्धक समूह कहा जाता है। उदाहरणार्थ, कर्मचारीगण समूहबद्ध होकर आर्थिक सहायता प्राप्त ट्रांसपोर्ट की सुविधा के लिए प्रबंधन पर दबाव डालते हैं तो ऐसे समूह को हितकारक समूह कहा जाता है।

मैत्रीपूर्ण समूह में घनिष्ठ मित्र या रिश्तेदार होते हैं। इन समूहों की

उत्पत्ति इसलिए होती है कि संगठन में कार्यरत होने के पूर्व से ही वे एक दूसरे से भलीभांति परिचित होते हैं और कार्यारंभ के प्राथमिक दौर में केवल वे ही आपस में परिचित होते हैं और कार्यारंभ के प्राथमिक तौर में केवल वे ही आपस में परिचित होते हैं। उनके ये सामाजिक संबंध आसानी से कार्यस्थिति के बाहर तक बने रहते हैं और जिनका आधार एक ही उम्र के होने या मूलनिवास की विरासत अथवा एक ही राजनीतिक विचारधारा के होने या फिर एक समान शौक आदि होने का हो सकता है।

(ii) क्लीक : औपचारिक समूहों के अन्य प्रकार को क्लीक अर्थात् गुट कहा जाता है। इन समूहों में सहकर्मीगण अथवा वे लोग होते हैं जो आपसी मेलजोज बनाए रखते हैं और कुछेक सामाजिक मानदण्डों और स्तरों का पालन किया करते हैं, किन्तु इनकी संख्या काफी कम हुआ करती है और शायद ही पाँच या छह से अधिक होती है। इनका उद्देश्य एक-दूसरे को मान्यता देना और आपसी हित का सूचना का आदान-प्रदान करना होता है।

एम. डाल्टन ने तीन प्रकार के क्लीकों की पहचान की है:

(a) वर्टिकल क्लीक : इस समूह में एक ही विभाग में काम कर रहे लोग होते हैं, भले ही उनके पद कुछ भी क्यों न हो। एक वरिष्ठ पदधारी भी अपने अधीनस्थों के साथ ऐसे समूह में शामिल होता है। ऐसे समूह में अधिकारों के क्रम का महत्त्व नहीं रह जाता क्योंकि उनके बीच पूर्व परिचय की स्थिति बनी हुई हो अथवा वरिष्ठ पदधारी कुछ औपचारिक प्रयोजनों के लिए अपने अधीनस्थों पर निर्भर करता हो जैसे कि अपनी योग्यताओं की कमियों को दूर करने के लिए।

(b) समस्तरीय क्लीक : इस समूह में ऐसे लोग होते हैं जो कमोबेश तौर पर समस्तरीय पदधारी होते हैं और लगभग एक ही क्षेत्र में कार्य किया करते हैं। इसके सदस्यगण आपस में सामान्यता के आधार पाते हैं और अपने उद्देश्यों के समूहबद्ध हुआ करते हैं। अनौपचारिक समूह का यह सबसे प्रचलित स्वरूप है।

(c) बेतरतीब या मिश्रित क्लीक : इस समूह के सदस्य विभिन्न पदधारी होते हैं और विभिन्न विभागों और स्थानों से हुआ करते हैं। एक बार फिर यह कि इनके बाद भी उनमें कुछ मान्यताएं तो होती हैं जो किसी समान प्रयोजन की दृष्टि से समूहबद्ध हुआ करते हैं। इसके सदस्य एक ही मुहल्ले में रहते हों, एक ही बस से आते-जाते हो या फिर एक ही क्लब के सदस्य हों।

(iii) सब-क्लीक : इस समूह में संगठन के किसी आंतरिक क्लीक के कुछ सदस्य उन लोगों से मिलकर समूह बना लेते हैं जो संगठन से बाहर के होते हैं। क्लीक के ये आंतरिक सदस्य उन बाहरी लोगों को इसलिए समर्थित करते हैं कि उनके अपने समूह के सदस्य उनके साथ सहयोजित होते हैं। संगठन के लिए ऐसे समूहों को आंशिक तौर पर बाहरी समझा जाता है।

(iv) सेलेसे का समूह वर्गीकरण : समूहों द्वारा अपनाई जाने वाली दबाव युक्तियों के आधार पर एस.आर, सेलेस ने संगठनों में चार प्रकार के समूहों की पहचान की है, जिन पर नीचे चर्चा की जा रही है।

(a) उदासीन समूह : सापेक्षिक तौर पर इस समूह को कुछ करता है। समूह में शायद ही कोई स्वीकृत नेता के रूप में उभरता है और शिकायतें ही हुआ करती हैं और यह दबाव युक्ति का शायद ही प्रयोग इसलिए इसमें सुस्पष्ट रूप से परिभाषित नेतृत्व का अभाव हुआ करता है। इसमें तुलनात्मक तौर पर कम वेतनभोगी और कम दक्ष असेम्बली लाइन के श्रमिक होते हैं जिसमें एकता और शक्ति नहीं होती और शायद ही किसी दबाव युक्ति का उपयोग किया करते हैं। संगठनों के प्रति ऐसे समूहों को उदासीन ही समझा जाता है।

(b) अनियमित समूह : इस समूह के सदस्यगणों को सहजता से उत्तेजित किया और आसानी से शांत किया जा सकता है। इसके व्यवहार में स्थिरता का अभाव होता है। कभी-कभार ये प्रबंधन के विरुद्ध प्रतिरोध जताते हैं तो अन्य अवसरों पर ये सहयोग के प्रतीक बन जाया करते हैं। ऐसे समूह में कोई सक्रिय सदस्य नेतृत्व की बागडोर सम्भाल लिया करता है। अर्धदक्ष श्रमिक ही ऐसे समूहों में शामिल हुआ करते हैं जिन्हें एक साथ
मिलकर अपना कार्य करना होता है जिसमें परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया की आवश्यकता बना करती है। इनमें काफी एकता होती है किनतु उनके व्यवहार का पूर्वानुमान लगाने में काफी कठिनाई हुआ करती है।

(c) कौशलनीतिगत समूह : इस समूह के सदस्यों में यह क्षमता होती है। अन्य समूहों और प्रबंधन पर दबाव बनाने के लिए वे अपनी कौशलनीति बनाएं। इस समूह के सदस्यगण सामान्यतया प्रौद्योगिकीय तौर पर स्वाधीन रूप से कार्य किया करते हैं और तुलनात्मक तौर पर पूर्व वर्णित वर्गों के सदस्यों से बेहतर स्थिति में हुआ करते हैं। इनके कार्यनिष्पादन का मूल्यांकन करने के लिए सही समय-मानक अपनाना कठिन है क्योंकि
इनके कार्य ऐसी प्रकृति के हुआ करते हैं कि उनमें व्यक्तिगत निर्णय का महत्त्व होता है। ये लोग उच्च तौर पर संगठित होते हैं और यूनियन गतिविधियों में लिप्त होते हैं। ये लोग सापेक्षिक तौर पर प्रतिरोध का वातावरण बनाए रखा करते हैं।

(d) संतुलित समूह : इन समूहों में संयंत्र के व्यावसायिक और उच्च दक्ष कर्मचारी शामिल होते हैं। इन्हें संगठन के उच्चतर स्तर पर देखा जा सकता है और इनमें काफी आत्मविश्वास होता है। ऐसे लोग स्वयं के पर अपना कार्यनिर्वाह किया करते हैं और उनकी कार्यप्रकृति कुछ इस प्रकार की होती है कि यदि वे चाहें तो संयंत्र का कार्य रुकवा सकते हैं। औपचारिक समूहों में इनका स्थान काफी सशक्त और स्थाई हुआ करता है। ऐसे समूह उच्च विशिष्टतागत उद्देश्यों के लिए नियंत्रित दबाव बनाते हैं और संयत आंतरिक एकता और आत्मसंयम का प्रदर्शन करते हैं। यूनियन कार्यालापों के संबंध में क्रिया-क्रियाहीनता के चक्र होते हैं।
अधिकतर इन्हें सहयोगात्मक रूप में पाया जाता है। प्रबंधन के विरुद्ध ये प्रतिकूल मनोवृत्ति तभी अपनाते हैं जब समूह सदस्यों द्वारा मिलकर उच्च विशिष्टतागत लक्ष्यों की माँग की जाती है।

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