समूह व्यवहार की कार्य और प्रकिया

समूह प्रक्रियाए आर कार्यलाप

संगठनों में समूहों की मुख्य प्रक्रियाओं और कार्यालापों के नीचे वर्णित किया जा रहा है:

(1) भूमिकाओं का नियतीकरण और स्पष्टीकरण : भूमिका का अभिप्राय लवहार की उस रूपरेखा से है जिसकी समूह में किसी नियत स्थिति पर कार्यरत सदस्य से प्रत्याशा की जाती है। इनसे अपने सदस्यों की भूमिकाओं का स्पष्टीकरण परिष्करण और सामंजस्य होता है। किसी औपचारिक समूह में सदस्यगण अपनी-अपनी भूमिकाओं में प्रत्याशाओं और बोधगम्यताओं को विकसित किया करते हैं। समूह के सदस्यों द्वारा अनेक भूमिकाओं का निर्वाह किया जाता है। कार्य संबंधित, संबंध अभिप्रेरित और स्वप्रेरित। सदस्यगण जिस तरह से बोध करते और अपनी भूमिकाओं का निर्वाह करते हैं उससे समूह कार्यालापों में अंतर्दृष्टि मिला करती है। भूमिकाओं के स्पष्टीकरण ओर संगति से सदस्यों के कार्यनिष्पादन और संतुष्टि में सुधार होता है।

(2) समूह समस्या समाधान और निर्णय लिया जानाः संगठनों में समूहों को अक्सर समस्या समाधान और निर्णय लिये जाने की इकाइयों के रूप में कार्य करना होता है। उदाहरणस्वरूप, कंपनी के निदेशक मण्डल को अनेक प्रमुख निर्णय लेने होते हैं। कई अर्थों में समूह समस्या समाधान और निर्णय लिए जाने से बेहतर हुआ करते हैं। समूहों द्वारा विभिन्न परिदृश्यों और दृष्टिकोणों से समस्याओं का आर-पार विश्लेषण किया जा सकता है। इसलिए समूह निर्णय अधिक युक्तियुक्त और स्वीकार्य हुआ करते हैं। समूह द्वारा अपने सदस्यों से प्रतिक्रिया करके नए विचारों और अभिनव विकल्पों को प्रदान किया जाता है। सदस्यों को भागीदारी से सदस्यों की वचनबद्धता, अभिप्रेरणा और उत्साह में सुधार होता है।

समूह निर्णय लिए जाने की अपनी सीमाबद्धता हुआ करती है। समूह निर्णय में समय लगा करती है और यह खर्चीला भी हुआ करती है। राजनीति दृष्टिकोणों से समझौते करने पड़ते हैं। समूहों द्वारा जोखिम भरे और उतावले निर्णय लेने पड़ते हैं क्योंकि वे आमतौर पर उनके कार्यान्वयन के लिए जिम्मेवार नहीं हुआ करते। समूह सोच का अभिप्राय उस प्रवृत्ति से है जो सदस्यों को किसी एक प्रभावी दृष्टिकोण की ओर ले जाती है ताकि एकमत का दृश्यप्रपंच बन सके और यह समूहों में आम बात हुआ करती
है।

(3) समूहों में नेतृत्व : समूहों में अक्सर आम सहमति से ही अनौपचारिक नेतृत्व उभरा करता है। औपचारिक नेतृत्व की बजाय इनके हाथों में अधिक शक्ति और प्रभाव हुआ करते हैं। ये लोग समूह सदस्यों की स्वीकार्यता और विश्वास अर्जित किया करते हैं। इनके समर्थन और सक्रियता से परिवर्तन लाने, विवादों का समाधान करने और संकट का समाधान करने में काफी सहायता मिला करती है। अनौपचारिक नेतागणों द्वारा समूह सदस्यों के मूल्यों और दृष्टिकोणों को आकार-स्वरूप दिया और उन्हें प्रदर्शित किया जाता है। इनके द्वारा सदस्यों का विश्वास और उनकी स्वीकार्यता अर्जित की जाती है। समूह नेताओं से प्रत्याशा की जाती है कि वे सदस्यों को दिशा की समझ और भावनात्मक समर्थन प्रदान करेंगे। ये लोग समूह की एकता और स्वायत्तता बनाए रखते हैं,करते हैं जिसमें सदस्य अच्छा कार्य कर सकें और सामाजिक संतुष्टि व्यवहार के मानदण्डों को लागू कराते हैं और एक ऐसा वातावरण निर्मित अर्जित कर सकें।

(4) समूह संप्रेषण एवं अंतक्रिया : समूह के सदस्यगण अपने कार्य के दौरान और सामाजिक संतुष्टि पाने के लिए आपस में संदेशों का संप्रेषण और अंतक्रिया किया करते हैं। लक्ष्य निर्धारण, निर्णयन, समाजीकरण, प्रबधन, विवाद समाधान और समूह संबद्धता के लिए ऐसे समूह के बीच और समूह के भीतर के संदेश संप्रेषणों और अंतक्रिओं की आवश्यकता बना सकती है। अनौपचारिक संप्रेषणों में संप्रेषण की औपचारिक विधियों को काम में नहीं लाया जाता। ये अनायास ही किए जाते हैं और सदस्यों के हितों से संबंधित विभिन्न मामलों को लेकर किए जाते हैं। औपचारिक संप्रेषण में बनी खाइयों को पाटते हैं और अधिक गतिशील हुआ करते हैं।

(5) समूह संबद्धता : इस शब्दविशेष-समूह संबद्धता का अभिप्राय.उस स्तर को व्यक्त करना है जिस तक समूहों के सदस्यगणों में एकता बनी होती है और परस्पर गुंधे होते हैं। यह सदस्यों के मध्य अंतर्वैयक्तिक.आसक्ति की मजबूती का प्रतिनिधित्व करता है, यह इसका प्रदर्शन करता है कि सदस्यगण किस विस्तार से एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हुआ करते
हैं और समूह के लक्ष्यों के प्रति लक्ष्यसिद्ध हुआ करते हैं। इस संबद्धता से सदस्यों के समूह में बने रहने की अभिप्रेरणा, समूह की संस्कृति और लक्ष्यों के प्रति समर्पित बने रहने, इसकी प्रगति में अपनी ऊर्जा लगाने,इसकी सफलता के प्रति अपने आपको वचनबद्ध बनाए रखने अर उसके सौभाग्यों से गर्वित होने का प्रदर्शन हुआ करता है। समूह-संबद्धता को किसी समूह के सदस्यों के मध्य घनिष्ठता और एकबद्धता का प्रतीक कहा जा सकता है।

समूह-संबद्धता को वांछित समूह-गुण के रूप में काफी मूल्यवान समझा जाता है। उच्च रूप से संबद्ध समूह के सदस्यों में समरूपी मनोवृत्तियों, मूल्यों और व्यावहारिक रूपरेखा विकसित होती है। वे अपने समूह के मानदण्डों और नेतृत्व का मनोयोग से अनुपालन किया करते हैं। साथ ही वे समूह के लक्ष्यों और नेतृत्व के प्रति निष्ठावान भी बने रहा करते हैं। उनमें सामूहिक रूप से समस्या समाधान और निर्णय लेने की योग्यता का उच्चस्तरीय विकास होता है। समूह कार्यालाप की प्रासंगिक कठिनाइयों और संकटों का वे सामूहिक रूप से और साहसपूर्वक सामना करते हैं। किसी उच्चस्तरीय संबद्ध समूह में सदस्यगण अपने कार्यालापों के प्रति सकारात्मक भाव अपनाया और उन्हें अच्छे ढंग से निपटाने के प्रयास करते हैं। अपने अंतर्वेयक्तिक संबंधों में वे पारस्परिक आदर,विश्वास और गर्मजोशी भी विकसित कर लिया करते हैं। समूह के साथ अपनी सहयोगिता से उन्हें काफी संतोष मिला करता है। किसी भी ऐस संबद्ध समूह की सदस्यता को दीर्घकाल तक स्थायित्व मिला करता है। ऐसे संबद्ध समूह के संगठनात्मक लक्ष्यों, मानदण्डों और मूल्यों में यदि निरंतरता का समावेश बना रह सके तो वह काफी फलदायक बना रहता है।

समूह की संबद्धता को अनेक तत्त्वों और ताकतों द्वारा प्रभावित किया जाता है। इन्हें नीचे दिया जा रहा है:

1. समूह-आकार : बड़े समूहों की तुलना में छोटे समूहों में अधिक संबद्धता हुआ करती है। जब सापेक्षिक तौर पर कम सदस्य होते हैं तो वे आपस में अधिकाधिक और खुले तौर पर क्रिया-प्रतिक्रिया और संप्रेषण किया करते हैं। इसके फलस्वरूप उनकी आपसी समझबूझ और वैचारिक भावनाओं का समुचित विकास होता है।

2. समूह-रचना : सापेक्षिक तौर पर ऐसा समूह अधिक संबद्ध हुआ करता है जिसके सदस्यों के उम्रवर्ग, शिक्षा, आय, हितों और मूल्यों में अधिक समरूपता हुआ करती है। विषमतागत समूह में कम संबद्धता हुआ करती है, जबकि समरूपी समूह में अच्छी संबद्धता बनी रहती है।

3. सदस्यों की अवस्थिति : एक ही भौगोलिक अवस्थिति में निकटतम रूप से कार्य कर रहे लोगों के बीच आपसी क्रिया-प्रतिक्रियाओं और संप्रेषणों के अधिक अवसर हुआ करते हैं। ऐसे समूह में अधिक संबद्धता का समावेश हुआ करता है

4. समूह-लक्ष्य और परिणाम : सदस्यगण जब समूह-लक्ष्यों के प्रति तात्विक रूप से आकर्षित या समर्पित हुआ करते हैं और यह अनुभव करते हैं कि अपनी जरूरतों को पूरा करने में उन्हें सफलता की संभावना है तो उनमें संबद्धता का भाव अधिक मजबूत होता है। यह भी कि समूह से अपनी सहयोगिता से उन्हें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में जब वस्तुतया सफलता मिलती है तो उनकी संबद्धता का भाव अधिक प्रबल हो जाया करता है। स्पष्ट, स्वीकार योग्य और प्राप्त कर सकने वाले लक्ष्यों से उनमें संबद्धता की भावना में और भी मजबूती आया करती है।

5. बाहरी दबाव : किसी बाहरी एजेंसियों के कारण जब समूह के अस्तित्व और उसकी सफलता पर संकटग्रस्त स्थिति बनती है तब उसके सदस्यगण स्वाभाविक तथा अपने मतभेदों को भुलाकर अपना एकजुट स्वरूप प्रस्तुत किया करते हैं।

6. प्रतिष्ठागत भेदभाव : सदस्यगणों के अपने ज्ञान, शक्तियों,योग्यताओं और उपलब्धियों में विसंगतियों को लेकर जब तीन प्रतिष्ठागत भेदभाव की स्थिति बना करती है तब संबद्धता की गुणवत्ता पिछड़ जाया करती है। किसी समूह के सदस्यों को जब समाज में उच्च प्रतिष्ठागत और सम्मान का स्थान मिलता है तो ऐसे समूह अधिकाधिक संबद्धता का समावेश बन जाया करता है।

7. समूह संरचना : किसी दोषपूर्ण संरचना वाले समूह की तुलना में ऐसा समूह अधिक संबद्धता हुआ करता है जिसकी सुसंगत संरचना हो, सदस्यों को विशिष्टतागत भूमिकाएं प्रदान की गई हों और उनके मध्य स्पष्ट संबंध बने हुए हों।

8. समूह वातावरण : गर्मजोशी भरे और मित्रतापूर्ण वातावरण में सदस्यों में स्वीकार्यता, सम्मान और मूल्यगत भावों का समावेश होता है और इसलिए ऐसे समूह में संबद्धता की आसान उत्पत्ति हुआ करती है। जिस समूह में व्यक्तित्वहीन और सैन्यगत वातावरण हो, उसमें संबद्धता का भाव कम ही हुआ करता है। सदस्यों के मध्य अच्छी क्रिया-प्रतिक्रियाओं को विकसित करने वाले प्रोग्रामरों से समूह की संबद्धता प्रबल बना करती है।

9. नेतृत्व : एक गर्मजोश, मित्रतापूर्ण और सक्षम नेता ही समूह की संबद्धता को उच्च स्तर तक ले जा सकता है। इसी तरह एक लोकतांत्रिक नेता द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया में व्यापक भागीदारी को प्रोत्साहित करके समूह की संबद्धता का समावेश किया जा सकता है।

10. सामाजिक पुरस्कार : ऐसा समूह जो अपने सदस्यों को उनके योगदानों के लिए अनुकूल सामाजिक पुरस्कार और सामाजिक.संतुष्टि प्रदान किया करता है, वह अधिक संबद्धतामय हुआ करता है।

(a) समूह-मानदण्ड : किसी समूह द्वारा अपने सदस्यों से प्रत्याशित व्यवहार और कार्य निष्पादन के संबंध में स्थापित किए गए मानकों,समूह-मानदण्डों के रूप में जाना जाता है। समूह-कार्यालाप के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में अपने सदस्यों के समुचित और अनुमतियोग्य आचरण के संबंध में समूह के आपसी विश्वासों और विचारों को ही समूह-मानदण्ड कहा जाता है। इन समूह-मानदण्डों को स्वयं सदस्यों द्वारा ही आपसी सहमति से स्थापित किया जाता है। सामान्यतया कालांतर में सामूहिक इच्छा या सहमति द्वारा परंपराओं के रूप में इन मानदण्डों का स्वरूप बना करता है।इन मानदण्डों का स्वरूप अक्सर मौखिक और अनौपचारिक ही हुआ करते हैं। इन मानदण्डों का स्वरूप अक्सर मौखिक और अनौपचारिक ही हुआ करते हैं। इन मानदण्डों का संबंध दोनों अंतवैयक्तिक व्यवहार और कार्य निष्पादन में हुआ करता है। अंतर्वैयक्तिक कवहार के मानदण्डों का एक उदाहरण यह है कि सदस्यगण अपनी बातचीत के दौरान अश्लील शब्दों का व्यवहार न किया करे। प्रत्येक सदस्य द्वारा अपने कार्यनिष्पादन के संबंध में मानदण्डों की 20 इकाइयों से अधिक का दैनिक उपयोग नहीं करना चाहिए।

मानदण्ड क्यों स्थापित किए जाते हैं? समूह द्वारा ये मानदण्ड इसलिए स्थापित किए जाते हैं कि सदस्यों द्वारा सुसंगत पूर्वअनुमानित और वाछित रूप व्यवहार किया जाता रहे। इन मानदण्डों से यह सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है कि सदस्यगण परस्पर प्रतिकूल दिशाओं में न जाएं और गलतफहमियों में न पढ़ा करें। ये मानदण्ड आचरण के नियमों की तरह होते हैं जिनका कि सदस्यों द्वारा समूह के भीतर और उससे बाहर अपने व्यवहार में पालन किए जाने की प्रत्याशा की जाती है। समूह द्वारा ये मानदण्ड अपने सदस्यों के व्यवहारगत और कार्यनिष्पादन के उन पक्षों के लिए स्थापित किए जाते हैं जिन्हें समूह के अस्तित्व और उसकी प्रभावोत्पादकता के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इन मानदण्डों से समूह के सदस्यों के कार्यालापों में संरचनात्मक, संतुलनगत और अनुशासनगत भाव निर्मित करने में सहायता मिला करती है। इन मानदण्डों की सहायता से सदस्यगण अपने समूह की संस्कृति से मेलमिलाप बनाते और उनका समाजीकरण किया करते हैं।

मानदण्डों को लागू कैसे किया जाता है? समूह के सदस्यों से यह प्रत्याशा की जाती है कि वे स्वैच्छिक रूप से उसके मानदण्डों का अनुपालन किया करें। समूह-मानदण्डों की पुष्टि और अनुपालन को समूह के प्रभावोत्पादक कार्यालाप का प्रतीक और प्रभावोत्पादक समूह-व्यवहार का पैमाना माना जाता है। तथापि, समूह द्वारा स्थिति के अनुरूप कुछेक अपवादों और छूटों की अनुमति दी जा सकती है। उदाहरणस्वरूप समूह में उच्च प्रतिष्ठापूर्ण और वरिष्ठता क्रम के सदस्यों को इन मानदण्डों पर अपने विवेकाधिकार या छूट का प्रयोग करने की अनुमति दी जा सकती है। समूहों द्वारा अपने मानदण्डों को लागू करने के लिए पुरस्कारों और दण्डों की पद्धति विकसित की जाती है। प्रोत्साहन स्वरूप पुरस्कारों की व्यवस्था की जाती है तो इनका अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए सदस्यों को दण्डित भी किया जाता है। पुरस्कारस्वरूप स्वीकार्यता,अनुशंसा, मान्यता, सुरक्षा, समर्थन, सूचना तक पहुँच की व्यवस्था होती है। इन पुरस्कारों को पाने के लिए सदस्यों से प्रत्याशा की जाती है कि वे समूह मानदण्डों की पुष्टि करेंगे। ये पुरस्कार अक्सर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्वरूप के हुआ करते हैं, यथा-समूह सदस्यता का यथावत बने रहना, समूह से सहभागिता में मजबूती लाना आदि। जबकि इसके प्रतिकूल होने पर दण्डों या शास्तियों के रूप में सामाजिक त्याग, भर्त्सना, निद्रा, हल्का अनुमोदन, व्यंग्य और उत्पीड़न, सदस्यता की समाप्ति और यहाँ तक कि शारीरिक हिंसा का प्रयोग किया जाता है जो कि प्रतिकूल व्यवहार के हल्केपन अथवा गंभीरता पर आश्रित हुआ करते हैं। इनके अतिरिक्त और भी सूक्ष्म सामाजिक दबावों का सहारा लिया जाता है ताकि समूह सदस्यों द्वारा मानदण्डों का पालन सुनिश्चित कराया जा सके।

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