सशक्तिकरण

सशक्तिकरण का महत्त्व

इन कारणों के चलते सशक्तिकरण हाल के वर्षों में एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया बन गई है-

1.बढ़ती प्रतिद्वंद्विता तथा त्वरित ग्राहक माँगे आदि के चलते प्रत्युत्तर की गति व उसका लचीलापन इतने अधिक रखने पड़ते हैं कि वह पुरानी वाली कण्ट्रोल व कमाण्ड व्यवस्था से कतई मेल नहीं खाते।बदलाव की बढ़ती रफ्तार, वातावरण में फैली हलचल,

2.संगठन स्वयं बदल रहे हैं। डाउनसाइजिंग, पतलेपन
(डी-लेयरिंग), तथा विकेन्द्रीकरण के चलते समन्वय एवं नियंत्रण पाने के पुराने तौर तरीके अब किसी काम के नहीं रह चले हैं। सो नयी परिस्थितियों में स्टाफ से यह उम्मीद बढ़ती जाती है कि वे अधिक से अधिक जिम्मेदारी लेते हुए अपना काम बखूबी करे।

3.अगर उन्हें अपने ग्राहकों की नित नयी माँगों को पूरा
करना है तो संगठनों को अलग-अलग कार्य क्षेत्रों के बीच ज्यादा से ज्यादा सहयोग व एकीकरण करना पड़ेगा। और इस तरह का सहयोग व एकीकरण सशक्तिकरण के बल पर ही सम्भव है।

4. समय के साथ-साथ श्रेष्ठ प्रबन्धन प्रतिभा को दिन-ब-
दिन विरल व महँगी माना जाने लगा है। ऐसे में इस तरह की प्रतिभा का उपयोग सीधे-सीधे कार्यकुशल कर्मचारी समूह के सुपरविजन के लिए करना चीजों को जटिल बनाये देता है। जबकि इसे ठीक उलट, सशक्तिकरण प्रबन्धकीय प्रतिभा को अन्दरूनी समस्या समाधान के बजाय बाहरी परिवर्तनों पर अपना ध्यान लगाने के योग्य बनाता है।

5.सशक्तिकरण के कारण प्रबन्धकीय प्रतिभा के ऐसे स्रोत पहचाने जा सकते हैं जो इसे पहले हरकत में नहीं आये थे। साथ ही इससे हमें उस माहौल की समझ भी आती है जिसमें इस तरह की प्रतिभा फलती फूलती है।

6. अब कर्मचारी पुरानी नियंत्रण व निर्देश केन्द्रित व्यवस्था को बिल्कुल भी नहीं चाहते। बढ़ती शिक्षा और उसकी उपलब्धता,आजीवन विकास पर अधिकाधिक जोर तथा कार्य सुरक्षा की पुरानी निश्चितता के चलते अब काम/जॉब को उसके द्वारा दिये जाने वाले विकास अवसरों के हिसाब से मूल्य दिया जाने लगा है न कि उनके अपने निजी हिसाब से। ऐसे में जो भी संस्थाएं ऐसी आकांक्षाओं को पूरा करने में असमर्थ रहेंगी वे अपने लिए आला स्तर का कार्य निष्पादन हासिल न कर
पाएंगी और श्रेष्ठ कर्मचारी उन्हें छोड़ चलते बनेंगे।

इसलिए सशक्त कम्पनियों में ये खूबियाँ झलकनी चाहिए-

(अ) संगठन में काम कर रहे हर व्यक्ति को इस हिसाब से आंका व प्रेरित किया जाता है कि वह अपना व्यक्तिगत योगदान दे;

(ब)सारे लोग अब इस बात से लगातार बेखबर रहते हैं कि वे क्या पाने के अलावा उसे क्योंकर पाना चाहते हैं और कम्पनी के व्यापक उद्देश्यों से वह किस कदर मेल खाता है;

(स)एक-दूसरे पर आरोप जड़ने की;

(द)कार्य-संस्कृति सहयोगात्मक व उद्देश्यपूर्ण होती है न कि व्यक्तिगत स्तर पर कर्मचारी न सिर्फ अपने काम की
जिम्मेदारी लेने को उत्सुक हैं, बल्कि अपने कार्य समूह तथा अपनी कम्पनी को सफलता की जिम्मेदारी भी ने अपने सिर पर महसूस करते हैं।

सशक्तिकरण के तत्त्व

सशक्तिकरण के बुनियादी तत्त्व हे कार्य निष्पादन, स्वामिल सेम दल व नेता, संस्कृति व डाँचा। सारे तत्त्व विस्तार से नीचे बताये गये है

निष्पादन- ऊचे का मतलब जरूरी नहीं अधिक ज्ञानी से हो। यदि सबसे न्यूनतम सम्भव स्तर पर निर्णय लिये जाने व चीजें कर सकने की आजादी हो तो समूची संस्था के कार्य निष्पादन में सुधार आ सकता है।

स्वामित्व-सशक्तिकरण का अर्थ ही है स्वामित्व। यह लोगों को शामिल करने का ऐसा तरीका है जिससे वे अपने कार्यों न अपने फैसलों के प्रति अपनी जिम्मेदारी अधिक से अधिक महसूस करते है। नतीजतन, कार्य निष्पादन बेहतर होता है।

टीम व लीडरशिप-पुराना पारम्परिक ढाँचा शेयरहोल्डर/स्टॉकहोल्डर मॉडल वाला है जिसमें संगठन का मतलब है शेयरहोल्डर्स के लिए मुनाफा कमाना और इसके लिए काम करने वाले शेयरहोल्डरों के नीचे आते हैं।

दरअसल, एक सशक्तिकरण संगठन लोगों के ज्ञान व अनुभव का लाभ लेना चाहता है। इसलिए लोगों के विकास में निवेश करना एक समझदारी भरा निर्णय हो सकता है। दरअसल मैनेजरों का विकास बहुतेरे रास्तों से होता है जिसमें शामिल होता है नयी नयी चुनौतियों का सामना करना व दूसरों के साथ  मिलाकर काम करना। कुल मिलाकर संगठन के विकास का मतलब है व्यक्तियों, टीमों व मैनेजर्स का विकास।
एक सशक्तिकरण संगठन नेतृत्व के जरिए निष्पादन व विकास अर्जित करता है। जब आत्म विश्वासी लोडर शक्तिशाली लोगों से बनी आत्म विश्वासी टीमों का नेतृत्व करते हैं तब वह संगठन कामयाब होता है।

संस्कृति व ढाँचा-ऐसे संगठन को एक ऐसी संस्कृति चाहिए होगी जो बदलाव के प्रति खुली व सकारात्मक हो। जापानी शब्द ‘कैजन’ का अर्थ है निरंतर बदलाव। काम करने की इस नयी रीति का असर यह होगा कि यह और सपाट होता जायेगा क्योंकि कर्मचारी अब पहले के मुकाबले अधिक जिम्मेदार हो चले हैं इसलिए प्रबन्धकों के कई अंतरिम स्तर अब बेमानी होते जायेंगे।
सशक्तिकारक संस्था अपने कर्मचारियों को उनकी अधिकतम कारगरता पर काम करने का अवसर देती है।

सशक्तिकरण के लिए आवश्यक शर्ते

सशक्तिकरण को संगठन के हर स्तर पर विश्वसनीयता व स्वीकार्यता मिले इसके लिए चार बुनियादी शतें निम्न हैं-

(अ) भागीदारी-कर्मचारियों को अपनी तरफ से पहल करने के लिए प्रेरित करते रहना चाहिए। इसके लिए राह में जो भी व्यवस्था सम्बन्धी मुश्किलें आती हो, उन्हें दूर किया जाना चाहिए। कर्मचारियों को इस बात का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि वे अधिक सक्रिय भागीदारी निभा सकें।

(ब) नवाचार-प्रबन्धकों को अपने कर्मचारियों को हमेशा कुछ न
कुछ नया करते रहने के लिए उकसाते रहना चाहिए ताकि काम करने के नये-नये अधिक प्रभावी तरीके खोजे जा सके। यहाँ तक कि जब कर्मचारी कुछ नया करने के चक्कर में कुछ गलत भी कर बैठे तो भी उन्हें प्रेरित करते रहना चाहिए ताकि वे जानें कि असफलता, सफलता की पहली पीढ़ी होती है।प्रोत्साहन से कर्मचारी अन्ततः बड़ी और महत्त्वपूर्ण सफलता हासिल करते हैं।

(स) जानकारी-कर्मचारियों को अपनी प्रतिभा को संवारने के लिए तमाम जरूरी जानकारी व संसाधन उपलब्ध होने चाहिए। अगर वे उपलब्ध जानकारी के उपयोग की दृष्टि से और प्रशिक्षण चाहते हैं तो वह उन्हें दिया जाना चाहिए।

(द) जवाबदेही-सशक्त कर्मचारियों को अपने काम के परिणाम के प्रति जवाबदेह माना जाना चाहिए। इसका अर्थ ये नहीं है कि उनके नुक्स, उनकी कमियाँ निकाली जाएं, बल्कि इसका मकसद है उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकने की गुंजाइश देना। इससे वे एक-दूसरे के साथ मिल कर काम करना सीखेंगे और अपने अन्य साथियों व संगठन के उद्देश्यों के प्रति खुद ही अपनी जवाबदेही महसूस करेंगे।

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