हरित मार्केटिंग

बहुत सी फर्मे सीमित साधनों को बनाये रखने अथवा ऐसे उत्पादों को ही विकसित करना जो पर्यावरण को हानि नहीं पहुँचाते, जैसी सामाजिक विपणन धारणा तो अपना रही तथा इस प्रकार हरित विपणन का अभ्यास कर रही हैं। उत्पादों का विकास तथा डिब्बाबन्दी जो पर्यावरण के लिए कम हानिकारक हो हरित विपणन में संलिप्त है। हरित विपणन के संरक्षण से लेकर प्रदूषण नियन्त्रण तक के कई क्षेत्र सम्मिलित हैं। उदाहरण विकसित करने के लिए पर्यावरणात्मक वर्गों से मिल गई है। प्रोक्टर पर गैनल कम्पनी ऐसे डिल्ले विकसित कर रही है जो पर्यावरण के लिए का हानिकारक है। वह निगम जो हरित विपणन में अच्छा काम कर रहे है उन कई प्रकार के लाभ प्राप्त हो सकते हैं जैसे प्राहकों, नियन्त्रित करने वालों, पूर्तिकर्ताओं तथा उद्योग में अन्य फर्मों से अच्छे सम्बन्ध।

एक सफल हरित विपणन कार्यक्रम के लिए कम्पनी के उच्च प्रबन्धन की वचनबद्धता का होना अत्यावश्यक है। इसके साथ ही कम्पनी का आंतरिक वातावरण ऐसा हो जो कर्मचारियों को पर्यावरण-संरक्षण के रूप में कार्य करने के लिए उत्साहित करें। कई कम्पनियों ने नये पटों की रचना की है जैसे “उप-प्रदान, पर्यावरण स्वास्थ्य तथा सुरक्षा दुसरी कुछ कम्पनियाँ व्यर्थता कम करने वाले कर्मचारियों तथा एसे उत्पाद निकसित कसे वाले कर्मचारियों को जो पर्यावरण के लिए हानिकारक न हो
पुरस्कृत करती है। परन्तु कम्पनियाँ जो सामाजिक उत्तरदायित्व रहित है हरित विपणन का दुरुपयोग भी कर सकती हैं। पर्यावरणात्मक रूप से सुदृढ उत्पादों की लोकप्रियता के कारण कई फर्मे अपने उत्पादों के सम्बन्ध में बहुत बढ़ा-चढ़ा कर प्रचार करती हैं ताकि उनका पर्यावरण सम्बन्धी लगाव नजर आये। इसलिए कुछ फर्मों ने यह सीखा है कि इस प्रकार वाकपटुता पर्याप्त नहीं है। उदाहरण के रूप में न्यूयार्क, कैलीफोर्निया तथा रोडी आइलैण्ड में ऐसे कानून बना दिये हैं जिनके अनुसार विपणनकर्ता को अपने उत्पाद के पर्यावरणात्मक लाभों के सम्बन्ध में बोलने की सीमा निश्चित कर दी है।

एक व्यक्ति जो पर्यावरण तथा हरित उत्पादों के सम्बन्ध में अधिक वचनबद्ध है प्रतियोगितात्मक बढ़त प्राप्त करेगा। परन्तु क्योंकि पर्यावरणात्मक दावों का प्रयोग उपभोक्ताओं को गुमराह करने के लिए किया जाता है कुछ फर्मों को हरित विपणन कार्यक्रमों को सफलतापूर्ण आरम्भ करना कठिन प्रतीत हो रहा है। इसके अतिरिक्त, कई प्रकरणों में उपभोक्ताओं ने हरित उत्पादों के सम्बन्ध में अच्छी प्रतिक्रिया नहीं दिखाई क्योंकि उत्पाद अस्पष्ट भाषा से घिरे हुए थे। शब्द जैसे recyclable, recycled, degra-dable, biodegradable, environment friendly de ozone safe
इन अस्पष्टतापूर्ण दावों के उदाहरण है। सफल हरित विपणन के लिए जितना सम्भव हो उतना ही संक्षिप्त होने की आवश्यकता है ताकि उपभोक्ता सन्देश में दर्शाये दावों को समझ सके। मुहावरा जैसे “इस उत्पाद में 60 प्रतिशत पुन: चक्रीय सामग्री है” को इस प्रकार प्रयोग करना चाहिए जैसे “पर्यावरण के लिए मैत्रीपूर्ण”।

इस सब के परिणामस्वरूप कई फर्मे अपने उत्पादों के सम्बन्ध में पर्यावरणात्मक दावे करने से पीछे हट गई यद्यपि वह ऐसे उत्पादों अथवा डिब्बाबन्दी का निरन्तर विकास कर रही हैं जो पर्यावरण के हित में है। इसके कारण में कुछ भाग इस बात का भी है कि फमें यह नहीं जानती कि उन द्वारा किया कौनसा दावा किस राज्य के कानून का उल्लंघन करता है। अभी तक कोई संयुक्त स्तर निर्धारित नहीं हुए हैं जो हरित विपणन को नियमित करें। मूल्य भी बड़ी बाधा है क्योंकि हरित उत्पाद विशेष रूप में अपने प्रतियोगी उत्पादों से महँगे होते हैं। लोग हरित उत्पादों को पसन्द करते हैं, यदि वह आसानी से उपलब्ध हो तथा उनका मूल्य और गुणवत्ता अन्य उत्पादों के समान हो।

1990 के हरित उपभोक्ता के कुछ मुख्य नियम:-

सर्व साधारण जनता में हरित वस्तुओं की तोजना से बदती हुई जागरुकता, इसकी लोकप्रियता तथा आवश्यकता को देखते हुए एलकिगायतथा हेल्ज’ ने 1990 की हरित उपभोक्ता के कुछ मुख्य नियमों की पहचान की है। साधारणतया हरित उपभोक्ता को ऐस उत्पाद/सेवाजादूर या चाहिए जिनकी सम्भावना है कि-

●उपभोक्ता अथवा किसी अन्य के स्वास्थ्य को खतरे में डालेगी।

●निर्माण, उपयोग अथवा त्याग के समय पर्यावरण को पर्याप्त क्षति पहुंचायेगी।

● निर्माण, उपयोग अथवा त्याग के समय तुलनात्मक रूप में अधिक ऊर्जा की खपत करती है।

●अनावश्यक व्यर्थता का कारण बनते हैं या तो   अतिरिक्त-डिब्बा बन्दी के कारण, अत्यन्त छोटा उपयोगी जीवन अथवा पुनः उपयोग न हो सकने के कारण।
 
●संकट में फंसी नस्लों अथवा वातावरण से ली गई सामग्री का प्रयोग।

●पशुओं का अनावश्यक उपयोग अथवा उन पर जुल्म, चाहे यह विषेलापन के परीक्षण के लिए हो अथवा अन्य कामों के लिए।

●दूसरे देशों पर कुप्रभाव विशेषकर निष्पक्ष देशों पर।

●जितने अधिक विस्तृत रूप में यह मौलिक नियम सामान्य जनता द्वारा उपभोक्ताओं के रूप में समझे तथा प्रोत्साहित किए जाते हैं उतना ही बड़ा प्रभाव उपभोक्ता व्यवहार पर होगा तथा परिणामस्वरूप बड़ा प्रभाव पूर्तिकर्ताओं द्वारा अनुसरण की गई उत्पाद बाजार युक्तियों पर जिनसे उपभोक्ता तथा उद्योग बाजार
भी सम्बन्धित होते है।

पर्यावरणात्मक सुचेतता तथा हरित उपभोक्ता व्यवहार, उपभोक्ता द्वारा शान्त किये जा सकते हैं। तब पश्चिम में औद्योगिक बाजार बढ़ते हुए दर पर बड़ता हुआ प्रभाव उछलता प्रभाव दर्शाता है। जनता को यह बढ़ती हुई जागरुकता तथा एक पर्यावरणात्मक सुचेत ढंग से कार्य करने को क्षमता केवल विस्तृत सामाजिक-सांस्कृतिक तथा राजनैतिक वातावरण जैसा कि यह क्षीण हो रहे प्रभावरणात्मक सन्दर्भ तथा बढ़ती जनसंख्या आदि की प्रतिक्रिया के रूप में विकसित होता है, दर्शायेगी।

पर्यावरण सम्बन्धी चिन्ताएं तथा भारतीय बाजार:-

भारत में विपणनकर्ताओं को अनियमित तथा उदार आर्थिक वातावरण में तीव्र आर्थिक विकास आरम्भ करने का न्योता दिया गया है। हमारे सामने यह सुनिश्चित करने का कार्य है कि हमारी सभी आर्थिक तथा सामाजिक प्रक्रियाओं में हम पर्यावरण लागतों का पूरा हिसाब ले। अब हम ऐसी स्थिति में है जहाँ धरती, वायु तथा जल में निम्नीकरण पहले ही हमारे देश में एक गम्भीर समस्या बन चुके है। बढ़ता हुआ वायु तथा जल प्रदूषण हमारे जीवन की गुणवत्ता को गम्भीर रूप में प्रभावित कर रहा है। विकास बढ़ने के साथ-साथ ऊर्जा तथा प्राकृतिक साधनों का प्रयोग भी बढ़ेगा। हमारे सामने इस समय जो चुनौती है उस का सामना करने के लिए हमें विकास का ऐसा नमूना तथा द्वेग अपनाना पड़ेगा जो हमारे साधनों पर असहनीय दबाव न डालें। विशेषकर ऐसे साधनों पर जिनका नवीनीकरण सम्भव नहीं। उद्योग को भली प्रकार जानना चाहिए कि उनका उत्तरदायित्व केवल अपने अंशधारको को ओर ही नहीं बल्कि संसार भर में अधिक जाने-जाने वाले अंशधारको विशेषकर उपभोक्ताओं तथा जनता के प्रति है। औद्योगिक प्रबन्धको का उत्तरदायित्व उपभोक्ताओं, श्रमिको, नागरिकों तथा निश्चय रूप में भविष्य को पीड़ियों के प्रति भी है इसी का अर्थ निरन्तर विकास है-विकास का एक दंग जो भविष्य की पीढ़ियों के विकल्पों को सीमित नहीं करता। इसी संदर्भ में पर्यावरण सम्बन्धी लेखा परीक्षण तथा हिसाब किताब तथा सभी पर्यावरणात्मक लागतों ने इतना महत्त्व प्राप्त कर लिया है। हमें पर्यावरण हितैषी मानक बनाने हैं बिना पुराना अनुज्ञापूर्ण तथा नियमबद्धता वाला ढंग पुन: स्थापित किये। उद्योग आत्म-नियमबद्धता द्वारा पर्यावरण तथा ऊर्जा परिरक्षण तथा अन्य प्राकृतिक साधनों का परिरक्षण उपलब्ध कराये। हो सकता है कि उपभोक्ताओं, अन्यत्रवासियों तथा पर्यावरण सम्बन्धी लोगों द्वारा सामान शक्तियों का उपयोग होता हो। यह वास्तव में पर्यावरणात्मक सुचेतता बढ़ाने की बात है। हमें नियमों के रूप में दबावों तथा यन्त्रवाद की आवश्यकता है जिसका उपयोग अच्छा उद्योग तथा विपणनकर्ता पर्यावरण हितैषी तकनीकों के लिए निरन्तर कर सकें। हमें पुन: नवीनीकरण योग्य विकल्पों पर भी बल देना चाहिए जहाँ उपलब्ध है। अपनी सभी आर्थिक प्रक्रियाओं में ऊर्जा संरक्षण तथा कौशलपूर्णता पर ध्यान देना आवश्यक है। अथवा औद्योगीकरण तथा उच्च उपयोग की ओर ले जा रहा असीमित उपभोक्तावाद आधुनिक प्राकृतिक हानियों के लिए उत्तरदायी है

पर्यावरण हितैषी उत्पाद :-

संगठित पर्यावरणात्मक अभियान ने पर्यावरणात्मक चिन्ताओं के सम्बन्ध में सुदृढ़ जनमत बना दिया है तथा जैसे-जैसे उपभोक्ता की सुचेतता बढ़ती है, उपभोक्ता को प्राथमिकताएं, कम्पनी के अंशधारकों की
ओर से बाजार व्यवहार के रूप में प्रदर्शित की जायेगी। जिससे व्यापार- प्रबन्ध विभाग उपभोक्ता नागरिकों की बदलती माँगों को पूरा करने के लिए विवश होगा। विपणनकर्ता पर्यावरणात्मक चिन्ताओं और समस्याओं को पहचानेगा। वह अपने उत्पादों को पर्यावरण हितैषी बना कर बेचना पसन्द करेगा।

हरित उपभोक्तावाद तथा पर्यावरण हितैषी वस्तुएं विपणनकर्ता को अपनी विपणन युक्तियों में हरी झलक जोड़ने के लिए उत्साहित करेगी जिससे वास्तविक पर्यावरणात्मक विचार प्रतिबिम्बित हो। कुछ ही वर्षों में विपणनकर्ताओं को भारत में पर्यावरण सुरक्षा को प्रमुख स्थान देना पड़ेगा। वास्तव में पर्यावरण हितैषी वस्तुओं का उत्पादन सामाजिक उत्तरदायित्व बन जायेगा तथा ऐसी वस्तुओं के लिए प्राथमिकता, निर्माताओं के लिए स्वयं ही अत्यधिक विपणन अवसर प्रदान करेगी। उत्पाद पर लगे ‘Ecomark’ लेबल प्रभाव संवर्धन विपणन यन्त्र बन सकते हैं।

हरित उपभोक्तावाद:-

उत्पाद जिनको तुरन्त ‘Ecomarking’ की आवश्यकता है कपड़ा, प्रसाधन साबुन, कपड़ा धोने के साबुन, कागज, पेन्ट, डिब्बाबन्दी, कीटनाशक तथा दवाइयाँ ‘Eco-mark’ लेबल के साथ यह उपभोक्ता वस्तुएं हरित उपभोक्तावाद की माँग को प्रेरित कर सकती हैं। जो कि ‘Ecomark’ योजना का मुख्य लक्ष्य है। इसके पश्चात् हम अन्य उपभोक्ता उत्पाद जैसे पेट्रोल, चिकनाई युक्त तेल, प्लास्टिक, लकड़ी के विकल्प, आहार योगज, प्रसाधन सामग्री, बैट्रीज तथा कृषि उत्पादों को ‘Ecomark’ के घेरे में ला सकते हैं। ‘Ecomark’ की सफल क्रियाशीलता कई धारणाओं पर आधारित
है


(1) कुछ उत्पाद हैं जिनको पर्यावरण हितैषी दिखाया जा सकता है तथा उनको ‘Ecomark’ किया जा सकता है।

(2) भोक्ता पर्यावरणात्मकता से सुचेत है तथा ऐसे उत्पादों को खरीदने के लिए तैयार है तथा यदि विकल्प उपलब्ध हो तो वह अपनी पसन्द का प्रयोग करने को तैयार है।

(3) निर्माताओं को भी पर्यावरण सम्बन्धी जानकारी है तथा वह भी ‘Eco-mark’ में पर्याप्त रुचि दिखाते हैं। भारत में केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण मण्डल ‘Ecomark’ योजना को स्वैच्छिक आधार पर लागू करने के अधिकार प्राप्त संस्था है। तथापि अभी तक हमने साबुनों/कपड़े धोने के पाउडरों (जो फॉस्फेट्स प्रयोग नहीं करते) आदि तक को ‘Ecomark’ मोहर में अधीन बेचना आरंभ नहीं किया।

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