HRM में नई अवधारणा

सेविवर्गीय प्रबंधक की भूमिका या प्रबंधकों को इस तरह से मदद व सहयोग करना होनी चाहिए कि मानव संसाधन का आदर्शता प्रयोग किया जा सके। मजदूरी विचार विमर्श, सामूहिक सौदेबाजी, पाली तथा सामाजिक कल्याण जैसे योगों को एक सेविवर्गीय पेशेवा की पेशेवर कुशलता तथा रणनीति की जरूरत होती है। उनकी शिक्षा तथा प्रशिक्षण के कारण वे इन उत्तम मामलों के हैडल करने हेतु सबसे अनुकूल व्यक्ति हैं। प्रोफेसर मनोरिया के अनुसार, ‘हमारे जैसे तेजी से परिवर्तित होते समाज में पेशेवर क्षेत्र में स्व विकास एक निरंतर लक्षण है जो सभी स्तरों पर बनाए रखना चाहिए नहीं तो अप्रचलन हमारी ऊर्जाओं को नष्ट कर देगा।

एक सेविवर्गीय प्रबंधक का कार्य बहुत परिवर्तित हुआ है। श्रम पर रायल कमीशन की अनुशंसाओं के बाद एक श्रम अधिकारी का कार्य था ‘नियोजन मामलों व श्रम परिवेदनाओं से डील करना’। कारखाना अधिनियम, 1948 के विधायन के बाद (धारा 49), सेविवर्गीय प्रबंधक की पहचान पैतृक श्रम कल्याण अधिकारी के साथ की गई थी। हालांकि उनकी भूमिका काफी हद तक कानूनी सीमाओं के भीतर रही, क्योंकि उनका उद्भव श्रम विधायन के कारण हुआ था। क्योंकि अच्छा श्रम कल्याण खराब प्रबंध का प्रतिस्थापन नहीं है अत: संगठन श्रमिकों के सामाजिक अच्छे में रुचि विकसित करने हेतु बाध्य हुए। इसके परिणामस्वरूप, सेविवर्गीय कार्यों का क्षेत्र विस्तारित हुआ, नए आयाम जोड़े गए, तथा जोर में परिवर्तन आया। इन परिवर्तनों के साथ सेविवर्गीय प्रबंधक की भूमिका में परिवर्तन भी जरूरी हो जाएगा। अत: सांस्कृतिक, सामाजिक तथा आर्थिक परिवर्तनों ने सेविवर्गीय प्रबंध के क्षेत्र में घुसपैठ कर ली है। मानव गौरव पर ज्यादा जोर तथा एक ज्यादा मजबूत व ज्यादा प्रकाशवान श्रम आंदोलन ने भारत में सेविवर्गीय प्रबंध के विकास के लिए अनुकूल वातावरण निर्मित किया है। इन परिवर्तनों के परिणामों का नीचे वर्णन किया गया है-

(1) सामूहिक निर्णयन में प्रवृत्तियाँ– मुख्यत: उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने में जरूरतमंद कर्मचारियों की सहायता करने के पैतृक प्रयल से भारत में औद्योगिक संगठन निर्णयन की एक सामूहिक सलाहकारी प्रक्रिया तक आ गए हैं जो कर्मचारियों को प्रभावित करती है। यह नियोजकों द्वारा ऐच्छिक स्वीकार्यता, शक्तिशाली श्रम संघों द्वारा सरकारी विधायन द्वारा आया है। नियोजकों तथा श्रम संघों की एक दूसरे के प्रति मनोवृत्ति धीरे-धीरे सुधरी है। शिक्षा तथा इसके अधिकारों की बढ़ती जागरुकता के साथ भारतीय कार्यशक्ति का प्रोफाइल बदल रहा है। इसके अधिकारों की बेहतर जागरूकता का परिणाम प्रबंध में सामूहिक भागिता की ज्यादा माँग में होगा।

(2) मानव संसाधन विकास पर ज्यादा जोर– सेविवर्गीय प्रबंध का भविष्य सेविवर्गीय सेवा के एक प्रशासक की जगह ज्यादा HRD के बारे में होगा। वह प्रबंध को व्यक्तिगत विकास तथा संगठनात्मक लक्ष्यों की प्राप्ति के बीच में संबंध पर सलाह देगा। वह स्वयं को वर्तमान मानव व्यवहारों के संबंध में सूत्र प्रबंधकों की सहायता करने के विचार से अर्थपूर्ण सेविवर्गीय शोध नियोजित करने में लगाएगा।

(3) श्रमिकों के प्रोफाइल में परिवर्तन– शिक्षित कार्यशक्ति कार्य स्थान में बेहतर स्वायत्तता तथा स्वेच्छा की माँग करेगी। शिक्षित की जरूरतों तथा महत्त्वाकांक्षाओं ने कार्य शक्ति के लैंगिक संघटन को बदल दिया है। इन महिला श्रमिकों ने स्वयं को स्थापित करना व उनके विरुद्ध ‘विभेद’ का प्रतिरोध करना शुरू कर दिया है। इन कारकों के परिणामस्वरूप वर्तमान सेविवर्गीय नीतियों में परिवर्तन हुआ है।

(4) उच्च प्रबंध की मनोवृत्ति में परिवर्तन– सेविवर्गीय प्रबंध कार्य का क्षेत्र, काफी सीमा तक संगठन में इसके महत्त्व तथा उच्च प्रबंध की मनोवृत्ति पर निर्भर करता है।

(5) सरकार की बढ़ती भूमिका– सेविवर्गीय कार्य में परिवर्तन काफी सीमा तक देश में सामाजिक-आर्थिक तथा कानूनी परिवर्तनों द्वारा नियंत्रित जरूरतों पर निर्भर करते हैं। विभिन्न श्रम कानूनों के विधायन ने एक सेविवर्गीय प्रबंधक की नियुक्ति जरूरी कर दी है जो संगठनों की तरफ से बदलते कानूनी दायित्वों पर प्रबंध को सलाह देने के लिए कानून का एक विशेषज्ञ है।

(6) निष्पादन आंकलन की बेहतर विधि-निष्पादन आंकलन या गुण श्रेणीकरण प्रबंध के सबसे पुरानी तथा ज्यादा सार्वभौमिक व्यवहारों में से एक है। यह समूह सदस्यों के व्यक्तित्वों तथा योगदानों एवं योग्यता का मूल्यांकन करने हेतु कार्यकारी संगठनों में प्रयुक्त सभी औपचारिक प्रक्रियाओं से संदर्भित है। कर्मचारियों की स्थायी निष्पादन आंकलन रिकॉर्ड प्रबंध की पर्यवेक्षकों के व्यक्तिगत ज्ञान पर एकमात्र निर्भरता छोड़ने में सहायता करते हैं। अतः निष्पादन आंकलन श्रमिकों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने के माध्यमों के रूप में कार्य करता है। श्रमिक वेतन तथा निष्पादन के बीच में एक नजदीकी संबंध को मूल्यवान मानेंगे तथा निश्चित ही किए कार्य के लिए बेहतर क्षतिपूर्ति प्राप्त करने हेतु ज्यादा कठिन परिश्रम करेंगे।

(7) अभिप्रेरणा को ज्यादा महत्त्व– अभिप्रेरणा स्वयं को कार्य करने की इच्छा से संबंधित करती है। यह कार्य के लिए प्रेरकों को जानना चाहती है तथा तरीकों तथा माध्यमों को पाने का प्रयत्न करती है जिनके द्वारा उनकी प्राप्ति में सहायता दी जा सके व उसे प्रोत्साहन दिया जा सके। एम.जे. ज्यूकिस के अनुसार अभिप्रेरणा है किसी को या स्वयं को कार्य के चाहे गए रास्ते को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करने की क्रिया । अभिप्रेरणा की परंपरागत प्रणाली ‘carrot and stick’ नीति अब प्रभावी नहीं है क्योंकि डर का तत्त्व उतना मजबूत नहीं है जितना पहले था।

आज कई सकारात्मक तथा मनोवैज्ञानिक पुरस्कार जैसे बेहतर मजदूरियाँ, रुचिपूर्ण तथा चुनौतीपूर्ण कार्य, सहभागिता प्रबंध बेहतर अभिप्रेरकों के रूप में कार्य करते हैं।

(8) बदलती कार्य नैतिकताएं– एक सेविवर्गीय प्रबंधक के कार्य प्राय: उसके द्वारा धारित पद या उसके द्वारा कब्जित कार्यालय को प्रदर्शित करते हैं बजाय उसके व्यक्तिगत विश्वासों के। एक पेशेवर होने के कारण एक सेविवर्गीय प्रबंधक को व्यवहार के कुछ नियमों पर निर्भर रहना चाहिए। एक पेशेवर के निर्णय तथा क्रियाएं कुछ नैतिक विचारों द्वारा निर्देशित होता है। अत: सेविवर्गीय प्रबंधक से अच्छे गुणवत्ता मानक तय
करने व लागू करने के लिए कहा जाएगा। उसे श्रमिकों की बदलती जरूरतों के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए।
हम भारत में सेविवर्गीय प्रबंध की भावी भूमिका को एम.एन. पांडे के शब्दों का प्रयोग करके खत्म कर सकते हैं जिसने अवलोकन किया कि जिस तरह वित्तीय व्यक्तियों का व्यवसाय निवेश पर आदर्शतम प्रत्याय प्राप्त करने के लिए संगठन के वित्तों का प्रबंध करना है, जिस तरह उत्पादन व्यक्तियों का व्यवसाय इस तरह से उसके नियंत्रण में विभिन्न संसाधनों का प्रयोग करना है कि आदर्शतम आउटपुट प्राप्त हो, उसी तरह सेविवर्गीय व्यक्तियों का काम सजातीयता, अभिप्रेरणा, संतुष्टि तथा प्रतिबद्धता सुनिश्चित करते हुए मानव संसाधन का प्रबंध करना है।

अत: भारतीय उद्योगों में सेविवर्गीय प्रबंध की भावी प्रवृत्तियाँ सेविवर्गीय प्रबंधक की भूमिका को परिवर्तित कर देंगी। उसके कार्य निश्चित ही परंपरागत क्षेत्रों जैसे मानव शक्ति नियोजन, चयन, भर्ती, प्रशिक्षण तथा कल्याण के प्रबंध से विस्तारित होंगे। बढ़ती सेविवर्गीय जरूरतों के आय, नए आयाम जोड़े जाएंगे।

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